Saturday, June 16, 2012

सभ्यता के संघर्ष में हिंदुत्व की पूर्व पीठिका :- 2

 वास्तव में सभ्यताओ का संघर्ष मूलत: सेमेटिक दर्शन और भारतीय दर्शन के बीच ही मुख्य रूप से हैं !
भारतीय दर्शन अगर पक्ष हैं तो सेमेटिक दर्शन विपक्ष ! ये आधुनिक युग में एक अलग प्रकार के देवासुर संग्राम की प्रस्तावना हैं !
ये देवासुर संग्राम का कलयुगी संस्करण हैं ! भारतीय दर्शन और सेमेटिक दर्शन की अवधारणाओ और संकल्पनाओ में एक मूलभूत गहरा

अंतर हैं ! ये एक दुसरे के ठीक विपरीत हैं ! सेमेटिक दर्शन की तुलना भारतीय दर्शन से नहीं हों सकती क्योकि एक अविकसित -

अपूर्ण मध्यकालीन बर्बरता से युक्त राजनितिक महत्वकांक्षा की साम्प्रदायिक अभिव्यक्ति  ही सेमेटिक दर्शन हैं, जबकि भारतीय दर्शन

एक सुव्यवस्थित वैचारिकी की लाखो वर्षों की परम्परा का नाम हैं ! परन्तु ऐतेहासिक विडंबना के तौर पर  बर्बरता ने उच्च किस्म की

बौद्धिकता व आध्यात्मिकता को पददलित कर विजित किया तो मामला भारतीय दर्शन बनाम सेमेटिक दर्शन हों भी गया !
शायद इसमे भारतीयों की महाभारत युद्ध के बाद सैनिक दृष्टि से कमजोर केन्द्रीय सत्त्ताओ ने अपने कृण्वन्तो विश्वार्यम ,दिग्विजय व
चक्रवर्ती साम्राज्य की संकल्पनाओ को परे धकेल दिया जिस कारण बाद की पीढ़ी के भाग्य में सर्वाधिक मार्मिक सैनिक हार के

सिलसिले का दुर्भाग्य लिखा गया ! बहरहाल अंतिम लड़ाई जीतने वाला ही विजेता होता हैं अत : इस मामले में पिक्चर अभी बाकी हैं

मेरे दोस्त ! सेमेटिक दर्शन के विभिन्न समुदाय जैसे मुसलमान , ईसाई व यहूदी आपस में युद्धरत हैं उसी प्रकार भारतीय हिंदू दर्शन की

भी आंतरिक मोर्चे में जबरदस्त संघर्ष की स्थिति बनी हुयी हैं ! अगर जय भारत करना हैं तो उससे पूर्व महाभारत भी जरूरी हैं ,
परन्तु इस महाभारत के आंतरिक और बाह्य दोनों मोर्चो पर कई बड़े चक्रव्यूह हैं जिन्हें भेदकर ही हम चक्रवर्ती हों सकते हैं !
धर्म युद्ध से पूर्व अंत:कर्ण की परम-शुद्धि आवश्यक हैं ! आएये कुछ कड़वी बाते करे क्योकि ये हमारी बीमार कमजोर आत्मा के लिये

अमृततुल्य ओषधि हैं       


                                                                                        ( क्रमश: )
                                                                              सुप्रसिद्ध समतामूलक विचारक
                                                                                     श्री विद्याभूषण       

सभ्यता के संघर्ष में हिंदुत्व की पूर्व पीठिका :-


सभ्यता के संघर्ष के सिद्धांत की बड़े पैमाना आलोच्य विषय रहा हैं ! कुछ लोग इसे मिथक या भ्रामक प्रोपेगंडा कहते हैं तथा कुछ इसे
तृतीय विश्व युद्ध की पूर्वपीठिका मानते हैं ! आतंकवाद के खिलाफ चल रहे  वैश्विक युद्ध के परिदृश्य में ये बात साफ़ उभर कर सामने आई हैं कि यह विषय केवल कोरी कल्पना नहीं हैं ! अलकायदा से जुड़े लोगों से मिली काव्यात्मक लेखन सामग्री ने साबित किया हैं कि वे  अमेरिका , इस्राएल व् भारत को संयुक्त रूप से इस्लाम का दुश्मन समझकर उनके खिलाफ इस्लामिक जेहाद चला रहे हैं !
इन देशो को ये गैर मुस्लिम , ईसाई -यहूदी एवं हिंदू देश के रूप में चिन्हित करते हैं ! ऐतिहासिक रूप से ईसाई व मुसलमानों में क्रूसेड एवं जेहाद का लंबा दौर रहा हैं ! कुरान में मुहम्मद साहब ने यहूदियों को सदा-सदा के लिये शाश्वत शत्रु के रूप में अभिशापित कर दिया हैं ! हिन्दुओ को मुस्लिम लोग एक ऐसे कौम मानते हैं जिसे वो विजित करने पर भी पूरी तरह खत्म नहीं कर पाये !
पूर्वाग्रह एवं परम्परागत- शाश्वत शत्रुता की इस खूनी लकीर को हमने नही उन्होंने परिभाषित किया हैं ! हम सबको तो ये सिर पर पड़ी आफत झेलनी पड रही हैं ! ईसाई भी सेमेटिक मूल के कारण दुनिया को दो भागो में विभाजित करते हैं तथा उनका एजेंडा भी एक दिव्य मिशन लेकर चलता हैं जो सारी दुनिया को ईसाई बनाना चाहता हैं ! यहूदी जो सेमेटिक दर्शन के मूल में हैं आजकल अपने रणनीतिक सहयोगी तलाश रहे हैं ! उन्हें हिन्दुओ में इसकी सम्भावना दिखती हैं ! भारतीय दर्शन वसुधैव कुटुंबकम् जैसे अवधारणाओ के कारण इस दुनिया के सभी प्राणियों के लिये सर्वोत्तम हैं ! अत: अगर इस्लाम अपनी उग्रता और बर्बरता के कारण मुख्य खल चरित्र हैं
और ईसाई धूसर नकारात्मक चरित्र व यहूदी सहयोगी बहुआयामी चरित्र अभिनेता है तो इस वैश्विक चलचित्र का नायक केवल और केवल हिंदू ही हैं ! जिसे अंत में इन सब पर अपनी श्रेष्ठता साबित करते हुये विजय श्री दर्ज करनी ही होगी !
                                                                                        ( क्रमश: )
                                                                              सुप्रसिद्ध समतामूलक विचारक
                                                                                     श्री विद्याभूषण