Saturday, June 16, 2012

सभ्यता के संघर्ष में हिंदुत्व की पूर्व पीठिका :- 2

 वास्तव में सभ्यताओ का संघर्ष मूलत: सेमेटिक दर्शन और भारतीय दर्शन के बीच ही मुख्य रूप से हैं !
भारतीय दर्शन अगर पक्ष हैं तो सेमेटिक दर्शन विपक्ष ! ये आधुनिक युग में एक अलग प्रकार के देवासुर संग्राम की प्रस्तावना हैं !
ये देवासुर संग्राम का कलयुगी संस्करण हैं ! भारतीय दर्शन और सेमेटिक दर्शन की अवधारणाओ और संकल्पनाओ में एक मूलभूत गहरा

अंतर हैं ! ये एक दुसरे के ठीक विपरीत हैं ! सेमेटिक दर्शन की तुलना भारतीय दर्शन से नहीं हों सकती क्योकि एक अविकसित -

अपूर्ण मध्यकालीन बर्बरता से युक्त राजनितिक महत्वकांक्षा की साम्प्रदायिक अभिव्यक्ति  ही सेमेटिक दर्शन हैं, जबकि भारतीय दर्शन

एक सुव्यवस्थित वैचारिकी की लाखो वर्षों की परम्परा का नाम हैं ! परन्तु ऐतेहासिक विडंबना के तौर पर  बर्बरता ने उच्च किस्म की

बौद्धिकता व आध्यात्मिकता को पददलित कर विजित किया तो मामला भारतीय दर्शन बनाम सेमेटिक दर्शन हों भी गया !
शायद इसमे भारतीयों की महाभारत युद्ध के बाद सैनिक दृष्टि से कमजोर केन्द्रीय सत्त्ताओ ने अपने कृण्वन्तो विश्वार्यम ,दिग्विजय व
चक्रवर्ती साम्राज्य की संकल्पनाओ को परे धकेल दिया जिस कारण बाद की पीढ़ी के भाग्य में सर्वाधिक मार्मिक सैनिक हार के

सिलसिले का दुर्भाग्य लिखा गया ! बहरहाल अंतिम लड़ाई जीतने वाला ही विजेता होता हैं अत : इस मामले में पिक्चर अभी बाकी हैं

मेरे दोस्त ! सेमेटिक दर्शन के विभिन्न समुदाय जैसे मुसलमान , ईसाई व यहूदी आपस में युद्धरत हैं उसी प्रकार भारतीय हिंदू दर्शन की

भी आंतरिक मोर्चे में जबरदस्त संघर्ष की स्थिति बनी हुयी हैं ! अगर जय भारत करना हैं तो उससे पूर्व महाभारत भी जरूरी हैं ,
परन्तु इस महाभारत के आंतरिक और बाह्य दोनों मोर्चो पर कई बड़े चक्रव्यूह हैं जिन्हें भेदकर ही हम चक्रवर्ती हों सकते हैं !
धर्म युद्ध से पूर्व अंत:कर्ण की परम-शुद्धि आवश्यक हैं ! आएये कुछ कड़वी बाते करे क्योकि ये हमारी बीमार कमजोर आत्मा के लिये

अमृततुल्य ओषधि हैं       


                                                                                        ( क्रमश: )
                                                                              सुप्रसिद्ध समतामूलक विचारक
                                                                                     श्री विद्याभूषण       

सभ्यता के संघर्ष में हिंदुत्व की पूर्व पीठिका :-


सभ्यता के संघर्ष के सिद्धांत की बड़े पैमाना आलोच्य विषय रहा हैं ! कुछ लोग इसे मिथक या भ्रामक प्रोपेगंडा कहते हैं तथा कुछ इसे
तृतीय विश्व युद्ध की पूर्वपीठिका मानते हैं ! आतंकवाद के खिलाफ चल रहे  वैश्विक युद्ध के परिदृश्य में ये बात साफ़ उभर कर सामने आई हैं कि यह विषय केवल कोरी कल्पना नहीं हैं ! अलकायदा से जुड़े लोगों से मिली काव्यात्मक लेखन सामग्री ने साबित किया हैं कि वे  अमेरिका , इस्राएल व् भारत को संयुक्त रूप से इस्लाम का दुश्मन समझकर उनके खिलाफ इस्लामिक जेहाद चला रहे हैं !
इन देशो को ये गैर मुस्लिम , ईसाई -यहूदी एवं हिंदू देश के रूप में चिन्हित करते हैं ! ऐतिहासिक रूप से ईसाई व मुसलमानों में क्रूसेड एवं जेहाद का लंबा दौर रहा हैं ! कुरान में मुहम्मद साहब ने यहूदियों को सदा-सदा के लिये शाश्वत शत्रु के रूप में अभिशापित कर दिया हैं ! हिन्दुओ को मुस्लिम लोग एक ऐसे कौम मानते हैं जिसे वो विजित करने पर भी पूरी तरह खत्म नहीं कर पाये !
पूर्वाग्रह एवं परम्परागत- शाश्वत शत्रुता की इस खूनी लकीर को हमने नही उन्होंने परिभाषित किया हैं ! हम सबको तो ये सिर पर पड़ी आफत झेलनी पड रही हैं ! ईसाई भी सेमेटिक मूल के कारण दुनिया को दो भागो में विभाजित करते हैं तथा उनका एजेंडा भी एक दिव्य मिशन लेकर चलता हैं जो सारी दुनिया को ईसाई बनाना चाहता हैं ! यहूदी जो सेमेटिक दर्शन के मूल में हैं आजकल अपने रणनीतिक सहयोगी तलाश रहे हैं ! उन्हें हिन्दुओ में इसकी सम्भावना दिखती हैं ! भारतीय दर्शन वसुधैव कुटुंबकम् जैसे अवधारणाओ के कारण इस दुनिया के सभी प्राणियों के लिये सर्वोत्तम हैं ! अत: अगर इस्लाम अपनी उग्रता और बर्बरता के कारण मुख्य खल चरित्र हैं
और ईसाई धूसर नकारात्मक चरित्र व यहूदी सहयोगी बहुआयामी चरित्र अभिनेता है तो इस वैश्विक चलचित्र का नायक केवल और केवल हिंदू ही हैं ! जिसे अंत में इन सब पर अपनी श्रेष्ठता साबित करते हुये विजय श्री दर्ज करनी ही होगी !
                                                                                        ( क्रमश: )
                                                                              सुप्रसिद्ध समतामूलक विचारक
                                                                                     श्री विद्याभूषण       

Wednesday, April 25, 2012

किसान आत्महत्या या हत्या

यूपी चुनाव में  टीवी पर एक राष्ट्रीय पार्टी का विज्ञापन आ रहा है जिसमे एक औरत दरवाजा खोलती है,एक युवक आता है
अब औरत कहती है  जब से इन्द्रा जी ने बैंको का राष्टीयकरण करके बैक के दरवाजे खोले है सब ठीक हो गया
यह एक चुनावी विज्ञापन है जो किसानों की आत्महत्याओ को छिपाने की कोशिश करता है, इस विज्ञापन के पीछे की स्थिति क्या है? जिसको  को विज्ञापन नही दिखा पाता असलियत ये है कि बिदर्भ के अकोला जिले के एक किसान ने इसलिए आत्महत्या कर ली क्योकि उसने कृषक को- ओपरेटिव सोसायटी से 37000 का कर्ज ले रखा था पांच एकड़ से जरा सा ज्यादा भूमि होने के कारण उसको कर्ज से माफ़ी तक ना मिली और फसल बर्बाद हो गयी वो अलग, उसके पांच बेटियां है जिनमे से दो शादी के योग्य  है ! वर्धा जिले के सेतुपद गाँव के किसान सुधाकर पोटे ने भी फाँसी लगा ली उसने भी कर्ज ले रखा था ओए पंद्रह एकड़ जमीन होने के कारण उसको सरकार से  कर्ज माफ़ ना हुआ, किसानों द्वारा की जा रही आत्महत्याओ के पीछे के कारण क्या है ? भारत में कृषि से  आधारित आजीविका पर आश्रित लोगों की संख्या साठ प्रतिशत के लगभग है और आमतौर पर किसानों को अपनी फसल के उत्पादन के लिए बहुत सारी चीजों की आवश्यकता पड़ती है, जिसमे खेत में बुबाई के लिए बीज से उसको मार्केट में पहुचने तक के लिए जिन संसाधनों की जरुरत होती है क्या वह उनके 
पास है;और सरकार उनके काम को यानि कृषि को लेकर जो निति निर्धारण करती है उसमे किसानों की आजीविका को भलीभांति चलाये रखने के काबिल है या नही! क्योकि  जिस तरह से लगातार किसान अपनी जान ले रहे है उसको देख कर साफ लग रहा है कि सरकार की निति किसानो के हित में नहीं है  आज देश में स्तिथि इस तरह की हो गयी है की किसान अपने आप को असहाय महसूस कर रहा है ! कोई एक वजह इस तादात में आत्महत्याओ  के लिए जिम्मेदार नही हो सकती है लेकिन कर्ज सबसे बड़ा कारण हो सकता ये कहना सही होगा, ये कर्ज सरकार का भी होता और जमींदार का भी, और जब किसान को लगने लगता है की अब वह अपना  कर्ज नही चूका पाएगा तो आत्महत्या कर लेता है इसके  पीछे आर्थिक-सामाजिक कारण भी है,
किसान की जितनी ज्यादा जमीन होगी उसकी सामाजिक इज्जत भी उतनी ही ज्यादा, और कर्ज भी उतना ही ज्यादा और जब किसान के घर बैंक या कर्ज देने वाले लोग जाते है तो वह महसूस करता है कि अब क्या बचा , सरकार कि कर्ज देने कि निति कि जिनती आलोचना की जाये उतनी ही कम है, क्योकि इसमे बैंक अपना पैसा देते है सरकार की नीतियों पर तो बैंक में 15 प्रतिशत से ज्यादा तो किसानों से पहले ही रिश्वत के रूप में खा जाते है दूसरा कर्ज लेते समय ही किसान ये मान कर चलता है कि कर्ज चुकाना है ही नहीं, सरकार माफ़ कर देगी,  
एक वजह और ये भी है की जब किसान के घर में उसकी फसल होती है तो उसके दम इतने कम होते है की लागत भी पूरी नही पड़ती और मार्केट इतनी कमजोर होती है उसकी फसल को खरीद भी नही पाती,  पिछले दिनों पंजाब  में किसानो ने आलू को सडको पर फेक दिया क्योकि उनको अपनी फसल का सही दम तक नही मिल रहा था, ये पंजाब की ही बात नहीं है हर जगह की बात है, गन्ना किसान गन्ने को उगाते है लेकिन 
सरकारी चीनी मिल उसको खरीदने की हालत में नहीं होती, खरीद भी ले तो उनके पैसे समय पर नही दे पाती. और रही सही क़सर उस समय निकल जाती है जब  मोसम के अनुरूप बारिश नही हो पाती, विदर्भ में किसानो के पास अपनों भूमि को सीचने के लिए पानी तक नही नही होता और बीज और खाद की महगाई इतनी है कि  उनके पास  बीज खरीदने के लिए पैसा है ना फसल में लगाने के लिए आवश्यक कीटनाशक दवाये, किसी तरह
 से ले भी आये जल स्तर इतना कम है कि पानी नही !
१९६० में एक सोने के सिक्के का मूल्य एक क्विंटल चावल था आज सोना दस गुना तक ज्यादा है तो किया क्या जाये! सरकारी आकडे बताते है कि  पिछले एक दशक में रहन सहन में 100 प्रतिशत  की बढ़ोतरी हुई है लेकिन फसलो के दम नही बढे है , इस तरह से देखे तो सरकार की किसानो के लिए जो नीतिया है वो साफ नही है, जिसकी वजह से किसान अपने खेतो में फसल की जगह आत्महत्ये उगा रहे है ये भारत जैसे देश का दुर्भाग्य है सब को जिन्दा रखने के लिए कृषि करने वाला किसान आत्महत्या कर रहा है 
और अंत में -
पता है जब कोई किसान कर्ज को वापस ना करने की स्थिति में आत्महत्या करता है ना ! 
तो उसके घर वाले समझ तक नही पते कि वह किसके लिए रोये? 
जो मर गया है उसके लिए या जो कर्ज अभी तक नहीं चुक पाया है उसके लिए ! 

   

भारत के आदिवासी




भारत में अनुसूचित आदिवासी समूहों की संख्या 292 है। सन् 1951 की जनगणना के अनुसार आदिवासियों की संख्या 1,91,11,498 है। देश की जनसंख्या का 5.36 प्रतिशत भाग आदिवासी स्तर का है।प्रजातीय दृष्टि से इन समूहों में नीग्रिटो, प्रोटो-आस्ट्रेलायड और मंगोलायड तत्व मुख्यत: पाए जाते हैं, यद्यपि कतिपय नृतत्ववेत्ताओं ने नीग्रिटो तत्व के संबंध में शंकाएँ उपस्थित की हैं। भाषाशास्त्र की दृष्टि से उन्हें आस्ट्रो-एशियाई, द्रविड़ और तिब्बती-चीनी-परिवारों की भाषाएँ बोलनेवाले समूहों में विभाजित किया जा सकता है। भौगोलिक दृष्टि से आदिवासी भारत का विभाजन चार प्रमुख क्षेत्रों में किया जा सकता है : उत्तरपूर्वीय क्षेत्र, मध्य क्षेत्र, पश्चिमी क्षेत्र और दक्षिणी क्षेत्र। 
उत्तर पूर्वीय क्षेत्र के अंतर्गत हिमालय अंचल के अतिरिक्त तिस्ता उपत्यका और ब्रह्मपुत्र की यमुना-पद्या-शाखा के पूर्वी भाग का पहाड़ी प्रदेश आता है। इस भाग के आदिवासी समूहों में गुरूंग, लिंबू, लेपचा, आका, डाफला, अबोर, मिरी, मिशमी, सिंगपी, मिकिर, राम, कवारी, गारो, खासी, नाग, कुकी, लुशाई, चकमा आदि उल्लेखनीय हैं। मध्यक्षेत्र का विस्तार उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर जिले के दक्षिणी ओर राजमहल पर्वतमाला के पश्चिमी भाग से लेकर दक्षिण की गोदावरी नदी तक है। संथाल, मुंडा, उरांव, हो, भूमिज, खड़िया, बिरहोर, जुआंग, खोंड, सवरा, गोंड, भील, बैगा, कोरकू, कमार आदि इस भाग के प्रमुख आदिवासी हैं। 
पश्चिमी क्षेत्र में भील, ठाकुर, कटकरी आदि आदिवासी निवास करते हैं। मध्य पश्चिम राजस्थान से होकर दक्षिण में सह्याद्रि तक का पश्चिमी प्रदेश इस क्षेत्र में आता है। गोदावरी के दक्षिण से कन्याकुमारी तक दक्षिणी क्षेत्र का विस्तार है। इस भाग में जो आदिवासी समूह रहते हैं उनमें चेंचू, कोंडा, रेड्डी, राजगोंड, कोया, कोलाम, कोटा, कुरूंबा, बडागा, टोडा, काडर, मलायन, मुशुवन, उराली, कनिक्कर आदि उल्लेखनीय हैं। 
नृतत्ववेत्ताओं ने इन समूहों में से अनेक का विशद शारीरिक, सामाजिक तथा सांस्कृतिक अध्ययन किया है। इस अध्ययन के आधार पर भौतिक संस्कृति तथा जीवनयापन के साधन सामाजिक संगठन, धर्म, बाह्य संस्कृति, प्रभाव आदि की दृष्टि से आदिवासी भारत के विभिन्न वर्गीकरण करने के अनेक वैज्ञानिक प्रयत्न किए गए हैं। इस परिचयात्मक रूपरेखा में इन सब प्रयत्नों का उल्लेख तक संभव नहीं है। आदिवासी संस्कृतियों की जटिल विभिन्नताओं का वर्णन करने के लिए भी यहाँ पर्याप्त स्थान नहीं है। यद्यपि प्राचीन काल में आदिवासियों ने भारतीय परंपरा के विकास में महत्वपूर्ण योगदान किया था और उनके कतिपय रीति रिवाज और विश्वास आज भी थोड़े बहुत परिवर्तित रूप में आधुनिक हिंदू समाज में देखे जा सकते हैं, तथापि यह निश्चित है कि वे बहुत पहले ही भारतीय समाज और संस्कृति के विकास की प्रमुख धारा से पृथक् हो गए थे। आदिवासी समूह हिंदू समाज से न केवल अनेक महत्वपूर्ण पक्षों में भिन्न है, वरन् उनके इन समूहों में भी कई महत्वपूर्ण अंतर हैं। समसामयिक आर्थिक शक्तियों तथा सामाजिक प्रभावों के कारण भारतीय समाज के इन विभिन्न अंगों की दूरी अब क्रमश: कम हो रही है। 
आदिवासियों की सांस्कृतिक भिन्नता को बनाए रखने में कई कारणों का योग रहा है। मनोवैज्ञानिक धरातल पर उनमें से अनेक में प्रबल "जनजाति-भावना" (ट्राइबल फीलिंग) है। सामाजिक-सांस्कृतिक-धरातल पर उनकी संस्कृतियों के गठन में केंद्रीय महत्व है। असम के नागा आदिवासियों की नरमुंडप्राप्ति प्रथा बस्तर के मुरियों की घोटुल संस्था, टोडा समूह में बहुपतित्व, कोया समूह में गोबलि की प्रथा आदि का उन समूहों की संस्कृति में बड़ा ही महत्वपूर्ण स्थान है। परंतु ये संस्थाएँ और प्रथाएँ भारतीय समाज की प्रमुख प्रवृत्तियों के अनुकूल नहीं हैं। आदिवासियों की संकलन-आखेटक-अर्थव्यवस्था तथा उससे कुछ अधिक विकसित अस्थिर और स्थिर कृषि की अर्थव्यवस्थाएँ अभी भी परंपरास्वीकृत प्रणाली द्वारा लाई जाती हैं। परंपरा का प्रभाव उनपर नए आर्थिक मूल्यों के प्रभाव की अपेक्षा अधिक है। धर्म के क्षेत्र में जीववाद, जीविवाद, पितृपूजा आदि हिंदू धर्म के समीप लाकर भी उन्हें भिन्न रखते हैं। आज के आदिवासी भारत में पर-संस्कृति-प्रभावों की दृष्टि से आदिवासियों के चार प्रमुख वर्ग दीख पड़ते हैं। प्रथम वर्ग में पर-संस्कृति-प्रभावहीन समूह हैं, दूसरे में पर-संस्कृतियों द्वारा अल्पप्रभावित समूह, तीसरे में पर-संस्कृतियों द्वारा प्रभावित, किंतु स्वतंत्र सांस्कृतिक अस्तित्ववाले समूह और चौथे वर्ग में ऐसे आदिवासी समूह आते हैं जिन्होंने पर-संस्कृतियों का स्वीकरण इस मात्रा में कर लिया है कि अब वे केवल नाममात्र के लिए आदिवासी रह गए हैं।

शूद्रों को ब्राह्मण बनाने वाले परशुराम

कथावाचक परशुराम की हिंसक घटनाओं के आख्यान तो खूब सुनाते हैं, लेकिन उनके समाज सुधार से जुड़े जो क्रांतिकारी सरोकार थे, उन्हें लगभग नजरअंदाज कर जाते हैं. क्या व्यक्ति केवल चरम हिंसा के बूते जन-नायक के रुप में स्थापित होकर लोकप्रिय हो सकता हैं? क्या कार्तवीर्य अर्जुन के वंश का समूल नाश करने के बावजूद पृथ्वी क्षत्रियों से विहीन हो पाई?

रामायण और महाभारत काल में संपूर्ण पृथ्वी पर क्षत्रिय राजाओं के राज्य था,  इक्ष्वाकु वंश के मर्यादा पुरुषोत्तम राम को आशीर्वाद देने वाले, कौरव नरेश धृतराष्ट को पाण्डवों से संधि करने की सलाह देने वाले और क्षत्रिय  भीष्म और सूत-पुत्र कर्ण को ब्रह्मशास्त्र की दीक्षा देने वाले परशुराम ही थे. परशुराम क्षत्रियों के शत्रु नहीं बल्कि शुभचिंतक थे , परशुराम केवल कुशासक और निरंकुश क्षत्रिय राजाओं के प्रबल विरोधी थे.

समाज सुधार में परशुराम का बहुत ही बड़ा योगदान रहा है . परशुराम ने शुद्र माने जाने वाले दरिद्र नारायणों को शिक्षित व दीक्षित कर उन्हें ब्राहम्ण बनाया. यज्ञोपवीत संस्कार से जोड़ा और उस समय जो दुराचारी व आचरणहीन ब्राहम्ण थे, उन्हें शूद्र घोषित कर उनका सामाजिक बहिष्कार किया. परशुराम के अंत्योदय के प्रकल्प अनूठे व अनुकरणीय हैं .

निरंकुश कुशासक हिष्मती नरेश "कार्तवीर्य अर्जुन" द्वारा पिता की हत्या, आश्रम के विनाश और गायों के अपहरण से कुपित व क्रोधित होकर परशुराम ने हैहय वंश के विनाश का संकल्प लिया था . इसके लिए भी एक पूरी सामरिक रणनीति बनाकर दो वर्ष तक लगातार परशुराम ने ऐसे सूर्यवंशी और यादववंशी राज्यों की यात्राएं की, जो हैह्य वंद्रवंशीयों के विरोधी थे. वाकचातुर्थ और नेतृत्व दक्षता के बूते परशुराम को ज्यादातर चंद्रवंशीयों ने समर्थन दिया.

इसमें परशुराम को अवन्तिका के यादव, विदर्भ के शर्यात यादव, पंचनद के द्रुह यादव, कान्यकुब्ज; कन्नौजद्ध के गाधिचंद्रवंशी, आर्यवर्त सम्राट सुदास सूर्यवंशी, गांगेय प्रदेश के काशीराज, गांधार नरेश मान्धता, अविस्थान अफगानिस्तानद्ध, मुजावत; हिन्दुकुशद्ध, मेरु, पामिरद्ध, श्री ;सीरियाद्ध परशुपुर; पारस, वर्तमानफारसद्ध सुसर्तु; पंजक्षीरद्ध उत्तर कुरु; चीनी सुतुर्किस्तानद्ध वल्क, आर्याण; ईरानद्ध देवलोक; षप्तसिंधुद्ध और अंग-बंग; बिहार के संथाल परगना से बंगाल तथा असम तकद्ध के राजाओं ने परशुराम का नेतृत्व स्वीकारते हुए इस महायुद्ध में भागीदारी की.

जबकि शेष रह गई क्षत्रिय जातियां चेदि; चंदेरीद्ध नरेश, कौशिक यादव, रेवत तुर्वसु, अनूप, रोचमान कार्तवीर्य अर्जुन की ओर से लड़ीं. इस भीषण युद्ध में अंततः कार्तवीर्य अर्जुन और उसके कुल के लोग तो मारे ही गए. युद्ध में अर्जुन का साथ देने वाली जातियों के वंशजों का भी लगभग समूल नाश हुआ.. भरतखण्ड में यह इतना बड़ा महायुद्ध था कि परशुराम ने अंहकारी व उन्मत्त क्षत्रिय राजाओं को, युद्ध में मार गिराते हुए अंत में लोहित क्षेत्र, अरुणाचल में पहुंचकर ब्रहम्पुत्र नदी में अपना फरसा धोया था. बाद में यहां पांच कुण्ड बनवाए गए जिन्हें समंतपंचका रुधिर कुण्ड कहा गया है.

ये कुण्ड आज भी अस्तित्व में हैं. इन्हीं कुण्डों में परशुराम ने युद्ध में हताहत हुए भृगु व सूर्यवंशीयों का तर्पण किया। इस विश्वयुद्ध का समय 7200 विक्रमसंवत पूर्व माना जाता है. इस युद्ध के बाद परशुराम ने समाज सुधार व कृषि के प्रकल्प हाथ में लिए। केरल, कोंकण मलबार और कच्छ क्षेत्र में समुद्र में डूबी ऐसी भूमि को बाहर निकाला जो खेती योग्य थी.

इस समय अगस्त्य ऋषि और इन्द्र समुद्री पानी को बाहर निकालने की तकनीक में निपुण थे. अगस्त्य को समुद्र का पानी पी जाने वाले ऋषि और इन्द्र को जल-देवता इसीलिए माना जाता है. परशुराम ने इसी क्षेत्र में परशु का उपयोग रचनात्मक काम के लिए किया। शूद्र माने जाने वाले लोगों को उन्होंने वन काटने में लगाया और उपजाउ भूमि तैयार करके धान की पैदावार शुरु कराईं.

इन्हीं शूद्रों को परशुराम ने शिक्षित व दीक्षित करके ब्राहम्ण बनाया। इन्हें जनेउ धारण कराए। और अक्षय तृतीया के दिन एक साथ हजारों युवक-युवतियों को परिणय सूत्र में बांधा था. परशुराम द्वारा अक्षयतृतीया के दिन सामूहिक विवाह कराये जाने के कारण ही इस दिन को परिणय बंधन का बिना किसी मुहूत्र्त के शुभ मुहूत्र्त माना जाता है.

परशुराम जी के इन्ही कार्यों की बजह से , उनके अनुयायी उन्हें भगवान के रुप में पूजते हैं।

भारतीय सिनेमा के सौ साल........!!!!




पिछले सौ सालों में सभ्यता ने कितना ही विकास
किया है...संस्कृति में न जाने कितने ही नयी चीज़ें आकार जुड़ गयी हैं...अभिव्यक्ति, अभिनय, नृत्य, गीत-संगीत ने मिल कर एक नया माध्यम बना डाला  "फिल्म-सिनेमा " का माध्यम .....फिल्मे जब बननी शुरू हुई तो मानों चमत्कार सा लगा...बंद मशीनों को मानों चलने का मुहावरा मिला....!!!...चित्र भी चलाने लगे...जिस से चलचित्र बन गया..!!!...फिल्मों की दुनिया भरत में हरिश्चंद्र (१९१२) ने शुरू की और फिर देखते ही देखते ...इस विधा को इतनी सराहना मिली की ....यथार्थवादी फिल्म,कलात्मक फिल्म, सामानांतर फिल्म, नयी धरा की फिल्म, व्यावसायिक फिल्म, अव्यवसायिक फिल्म....जैसे न जाने कितने प्रकार की फिल्मे सामने आयीं...पथेर पांचाली (1955) अपराजितो (1956) जैसी महान फिल्मो ने आते ही भारतीय सिनेमा में रौशनी फूंक दी...वही गुरु दत्त ने फिल्मे दी जिनमे प्यासा (1957) और कागज़ के फूल (1959) मील के पत्थर साबित हुए!
वहीँ राजकपूर की फिल्म आवारा (१९५१, महबूब खान की फिल्म मदर इंडिया (1957), और क. आसिफ खान की महान फिल्म मुग़ल-इ-आज़म(1960) , शांताराम की दो आँखें बारह हाथ (1957)...इतिहास के स्वर्णिम अक्षरों में ल्लिख दी गयीं.....!!!

उसके बाद के सिनेमा को देखें तो पेरेलल सिनेमा के काल ने जो फ़िल्मी दुनिया को चमकते सितारे दिए उनकी रौशनी शायद ही कभी कम हो ..जिसने सत्यजीत रे,ऋत्विक घटक, मृणाल सेन, मणि कॉल, कुमार सहनी, केतन मेहता जैसे विलक्षण कलाकार दिए...!!!!...और इन्होने इस फ़िल्मी दुनिया को एक नया नाम दे कर इसे महान कला -अभिव्यक्ति का साधन बना डाला....जिसे आज के कलाकार बखूभी निभा रहे हैं............

"भारतीय सिनेमा को उसके 100 वर्षों की सफलता पर हार्दिक शुभकामनायें "