वास्तव में सभ्यताओ का संघर्ष मूलत: सेमेटिक दर्शन और भारतीय दर्शन के बीच ही मुख्य रूप से हैं !
भारतीय दर्शन अगर पक्ष हैं तो सेमेटिक दर्शन विपक्ष ! ये आधुनिक युग में एक अलग प्रकार के देवासुर संग्राम की प्रस्तावना हैं !
ये देवासुर संग्राम का कलयुगी संस्करण हैं ! भारतीय दर्शन और सेमेटिक दर्शन की अवधारणाओ और संकल्पनाओ में एक मूलभूत गहरा
अंतर हैं ! ये एक दुसरे के ठीक विपरीत हैं ! सेमेटिक दर्शन की तुलना भारतीय दर्शन से नहीं हों सकती क्योकि एक अविकसित -
अपूर्ण मध्यकालीन बर्बरता से युक्त राजनितिक महत्वकांक्षा की साम्प्रदायिक अभिव्यक्ति ही सेमेटिक दर्शन हैं, जबकि भारतीय दर्शन
एक सुव्यवस्थित वैचारिकी की लाखो वर्षों की परम्परा का नाम हैं ! परन्तु ऐतेहासिक विडंबना के तौर पर बर्बरता ने उच्च किस्म की
बौद्धिकता व आध्यात्मिकता को पददलित कर विजित किया तो मामला भारतीय दर्शन बनाम सेमेटिक दर्शन हों भी गया !
शायद इसमे भारतीयों की महाभारत युद्ध के बाद सैनिक दृष्टि से कमजोर केन्द्रीय सत्त्ताओ ने अपने कृण्वन्तो विश्वार्यम ,दिग्विजय व
चक्रवर्ती साम्राज्य की संकल्पनाओ को परे धकेल दिया जिस कारण बाद की पीढ़ी के भाग्य में सर्वाधिक मार्मिक सैनिक हार के
सिलसिले का दुर्भाग्य लिखा गया ! बहरहाल अंतिम लड़ाई जीतने वाला ही विजेता होता हैं अत : इस मामले में पिक्चर अभी बाकी हैं
मेरे दोस्त ! सेमेटिक दर्शन के विभिन्न समुदाय जैसे मुसलमान , ईसाई व यहूदी आपस में युद्धरत हैं उसी प्रकार भारतीय हिंदू दर्शन की
भी आंतरिक मोर्चे में जबरदस्त संघर्ष की स्थिति बनी हुयी हैं ! अगर जय भारत करना हैं तो उससे पूर्व महाभारत भी जरूरी हैं ,
परन्तु इस महाभारत के आंतरिक और बाह्य दोनों मोर्चो पर कई बड़े चक्रव्यूह हैं जिन्हें भेदकर ही हम चक्रवर्ती हों सकते हैं !
धर्म युद्ध से पूर्व अंत:कर्ण की परम-शुद्धि आवश्यक हैं ! आएये कुछ कड़वी बाते करे क्योकि ये हमारी बीमार कमजोर आत्मा के लिये
अमृततुल्य ओषधि हैं
( क्रमश: )
सुप्रसिद्ध समतामूलक विचारक
श्री विद्याभूषण
भारतीय दर्शन अगर पक्ष हैं तो सेमेटिक दर्शन विपक्ष ! ये आधुनिक युग में एक अलग प्रकार के देवासुर संग्राम की प्रस्तावना हैं !
ये देवासुर संग्राम का कलयुगी संस्करण हैं ! भारतीय दर्शन और सेमेटिक दर्शन की अवधारणाओ और संकल्पनाओ में एक मूलभूत गहरा
अंतर हैं ! ये एक दुसरे के ठीक विपरीत हैं ! सेमेटिक दर्शन की तुलना भारतीय दर्शन से नहीं हों सकती क्योकि एक अविकसित -
अपूर्ण मध्यकालीन बर्बरता से युक्त राजनितिक महत्वकांक्षा की साम्प्रदायिक अभिव्यक्ति ही सेमेटिक दर्शन हैं, जबकि भारतीय दर्शन
एक सुव्यवस्थित वैचारिकी की लाखो वर्षों की परम्परा का नाम हैं ! परन्तु ऐतेहासिक विडंबना के तौर पर बर्बरता ने उच्च किस्म की
बौद्धिकता व आध्यात्मिकता को पददलित कर विजित किया तो मामला भारतीय दर्शन बनाम सेमेटिक दर्शन हों भी गया !
शायद इसमे भारतीयों की महाभारत युद्ध के बाद सैनिक दृष्टि से कमजोर केन्द्रीय सत्त्ताओ ने अपने कृण्वन्तो विश्वार्यम ,दिग्विजय व
चक्रवर्ती साम्राज्य की संकल्पनाओ को परे धकेल दिया जिस कारण बाद की पीढ़ी के भाग्य में सर्वाधिक मार्मिक सैनिक हार के
सिलसिले का दुर्भाग्य लिखा गया ! बहरहाल अंतिम लड़ाई जीतने वाला ही विजेता होता हैं अत : इस मामले में पिक्चर अभी बाकी हैं
मेरे दोस्त ! सेमेटिक दर्शन के विभिन्न समुदाय जैसे मुसलमान , ईसाई व यहूदी आपस में युद्धरत हैं उसी प्रकार भारतीय हिंदू दर्शन की
भी आंतरिक मोर्चे में जबरदस्त संघर्ष की स्थिति बनी हुयी हैं ! अगर जय भारत करना हैं तो उससे पूर्व महाभारत भी जरूरी हैं ,
परन्तु इस महाभारत के आंतरिक और बाह्य दोनों मोर्चो पर कई बड़े चक्रव्यूह हैं जिन्हें भेदकर ही हम चक्रवर्ती हों सकते हैं !
धर्म युद्ध से पूर्व अंत:कर्ण की परम-शुद्धि आवश्यक हैं ! आएये कुछ कड़वी बाते करे क्योकि ये हमारी बीमार कमजोर आत्मा के लिये
अमृततुल्य ओषधि हैं
( क्रमश: )
सुप्रसिद्ध समतामूलक विचारक
श्री विद्याभूषण