पिछले सौ सालों में सभ्यता ने कितना ही विकास किया है...संस्कृति में न जाने कितने ही नयी चीज़ें आकार जुड़ गयी हैं...अभिव्यक्ति, अभिनय, नृत्य, गीत-संगीत ने मिल कर एक नया माध्यम बना डाला "फिल्म-सिनेमा " का माध्यम .....फिल्मे जब बननी शुरू हुई तो मानों चमत्कार सा लगा...बंद मशीनों को मानों चलने का मुहावरा मिला....!!!...चित्र भी चलाने लगे...जिस से चलचित्र बन गया..!!!...फिल्मों की दुनिया भरत में हरिश्चंद्र (१९१२) ने शुरू की और फिर देखते ही देखते ...इस विधा को इतनी सराहना मिली की ....यथार्थवादी फिल्म,कलात्मक फिल्म, सामानांतर फिल्म, नयी धरा की फिल्म, व्यावसायिक फिल्म, अव्यवसायिक फिल्म....जैसे न जाने कितने प्रकार की फिल्मे सामने आयीं...पथेर पांचाली (1955) अपराजितो (1956) जैसी महान फिल्मो ने आते ही भारतीय सिनेमा में रौशनी फूंक दी...वही गुरु दत्त ने फिल्मे दी जिनमे प्यासा (1957) और कागज़ के फूल (1959) मील के पत्थर साबित हुए!
वहीँ राजकपूर की फिल्म आवारा (१९५१, महबूब खान की फिल्म मदर इंडिया (1957), और क. आसिफ खान की महान फिल्म मुग़ल-इ-आज़म(1960) , शांताराम की दो आँखें बारह हाथ (1957)...इतिहास के स्वर्णिम अक्षरों में ल्लिख दी गयीं.....!!!
उसके बाद के सिनेमा को देखें तो पेरेलल सिनेमा के काल ने जो फ़िल्मी दुनिया को चमकते सितारे दिए उनकी रौशनी शायद ही कभी कम हो ..जिसने सत्यजीत रे,ऋत्विक घटक, मृणाल सेन, मणि कॉल, कुमार सहनी, केतन मेहता जैसे विलक्षण कलाकार दिए...!!!!...और इन्होने इस फ़िल्मी दुनिया को एक नया नाम दे कर इसे महान कला -अभिव्यक्ति का साधन बना डाला....जिसे आज के कलाकार बखूभी निभा रहे हैं............
"भारतीय सिनेमा को उसके 100 वर्षों की सफलता पर हार्दिक शुभकामनायें "
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