Wednesday, April 25, 2012

शूद्रों को ब्राह्मण बनाने वाले परशुराम

कथावाचक परशुराम की हिंसक घटनाओं के आख्यान तो खूब सुनाते हैं, लेकिन उनके समाज सुधार से जुड़े जो क्रांतिकारी सरोकार थे, उन्हें लगभग नजरअंदाज कर जाते हैं. क्या व्यक्ति केवल चरम हिंसा के बूते जन-नायक के रुप में स्थापित होकर लोकप्रिय हो सकता हैं? क्या कार्तवीर्य अर्जुन के वंश का समूल नाश करने के बावजूद पृथ्वी क्षत्रियों से विहीन हो पाई?

रामायण और महाभारत काल में संपूर्ण पृथ्वी पर क्षत्रिय राजाओं के राज्य था,  इक्ष्वाकु वंश के मर्यादा पुरुषोत्तम राम को आशीर्वाद देने वाले, कौरव नरेश धृतराष्ट को पाण्डवों से संधि करने की सलाह देने वाले और क्षत्रिय  भीष्म और सूत-पुत्र कर्ण को ब्रह्मशास्त्र की दीक्षा देने वाले परशुराम ही थे. परशुराम क्षत्रियों के शत्रु नहीं बल्कि शुभचिंतक थे , परशुराम केवल कुशासक और निरंकुश क्षत्रिय राजाओं के प्रबल विरोधी थे.

समाज सुधार में परशुराम का बहुत ही बड़ा योगदान रहा है . परशुराम ने शुद्र माने जाने वाले दरिद्र नारायणों को शिक्षित व दीक्षित कर उन्हें ब्राहम्ण बनाया. यज्ञोपवीत संस्कार से जोड़ा और उस समय जो दुराचारी व आचरणहीन ब्राहम्ण थे, उन्हें शूद्र घोषित कर उनका सामाजिक बहिष्कार किया. परशुराम के अंत्योदय के प्रकल्प अनूठे व अनुकरणीय हैं .

निरंकुश कुशासक हिष्मती नरेश "कार्तवीर्य अर्जुन" द्वारा पिता की हत्या, आश्रम के विनाश और गायों के अपहरण से कुपित व क्रोधित होकर परशुराम ने हैहय वंश के विनाश का संकल्प लिया था . इसके लिए भी एक पूरी सामरिक रणनीति बनाकर दो वर्ष तक लगातार परशुराम ने ऐसे सूर्यवंशी और यादववंशी राज्यों की यात्राएं की, जो हैह्य वंद्रवंशीयों के विरोधी थे. वाकचातुर्थ और नेतृत्व दक्षता के बूते परशुराम को ज्यादातर चंद्रवंशीयों ने समर्थन दिया.

इसमें परशुराम को अवन्तिका के यादव, विदर्भ के शर्यात यादव, पंचनद के द्रुह यादव, कान्यकुब्ज; कन्नौजद्ध के गाधिचंद्रवंशी, आर्यवर्त सम्राट सुदास सूर्यवंशी, गांगेय प्रदेश के काशीराज, गांधार नरेश मान्धता, अविस्थान अफगानिस्तानद्ध, मुजावत; हिन्दुकुशद्ध, मेरु, पामिरद्ध, श्री ;सीरियाद्ध परशुपुर; पारस, वर्तमानफारसद्ध सुसर्तु; पंजक्षीरद्ध उत्तर कुरु; चीनी सुतुर्किस्तानद्ध वल्क, आर्याण; ईरानद्ध देवलोक; षप्तसिंधुद्ध और अंग-बंग; बिहार के संथाल परगना से बंगाल तथा असम तकद्ध के राजाओं ने परशुराम का नेतृत्व स्वीकारते हुए इस महायुद्ध में भागीदारी की.

जबकि शेष रह गई क्षत्रिय जातियां चेदि; चंदेरीद्ध नरेश, कौशिक यादव, रेवत तुर्वसु, अनूप, रोचमान कार्तवीर्य अर्जुन की ओर से लड़ीं. इस भीषण युद्ध में अंततः कार्तवीर्य अर्जुन और उसके कुल के लोग तो मारे ही गए. युद्ध में अर्जुन का साथ देने वाली जातियों के वंशजों का भी लगभग समूल नाश हुआ.. भरतखण्ड में यह इतना बड़ा महायुद्ध था कि परशुराम ने अंहकारी व उन्मत्त क्षत्रिय राजाओं को, युद्ध में मार गिराते हुए अंत में लोहित क्षेत्र, अरुणाचल में पहुंचकर ब्रहम्पुत्र नदी में अपना फरसा धोया था. बाद में यहां पांच कुण्ड बनवाए गए जिन्हें समंतपंचका रुधिर कुण्ड कहा गया है.

ये कुण्ड आज भी अस्तित्व में हैं. इन्हीं कुण्डों में परशुराम ने युद्ध में हताहत हुए भृगु व सूर्यवंशीयों का तर्पण किया। इस विश्वयुद्ध का समय 7200 विक्रमसंवत पूर्व माना जाता है. इस युद्ध के बाद परशुराम ने समाज सुधार व कृषि के प्रकल्प हाथ में लिए। केरल, कोंकण मलबार और कच्छ क्षेत्र में समुद्र में डूबी ऐसी भूमि को बाहर निकाला जो खेती योग्य थी.

इस समय अगस्त्य ऋषि और इन्द्र समुद्री पानी को बाहर निकालने की तकनीक में निपुण थे. अगस्त्य को समुद्र का पानी पी जाने वाले ऋषि और इन्द्र को जल-देवता इसीलिए माना जाता है. परशुराम ने इसी क्षेत्र में परशु का उपयोग रचनात्मक काम के लिए किया। शूद्र माने जाने वाले लोगों को उन्होंने वन काटने में लगाया और उपजाउ भूमि तैयार करके धान की पैदावार शुरु कराईं.

इन्हीं शूद्रों को परशुराम ने शिक्षित व दीक्षित करके ब्राहम्ण बनाया। इन्हें जनेउ धारण कराए। और अक्षय तृतीया के दिन एक साथ हजारों युवक-युवतियों को परिणय सूत्र में बांधा था. परशुराम द्वारा अक्षयतृतीया के दिन सामूहिक विवाह कराये जाने के कारण ही इस दिन को परिणय बंधन का बिना किसी मुहूत्र्त के शुभ मुहूत्र्त माना जाता है.

परशुराम जी के इन्ही कार्यों की बजह से , उनके अनुयायी उन्हें भगवान के रुप में पूजते हैं।

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