Wednesday, June 15, 2022

श्रीलंकाई संसद सदस्य अच्चिगे पटाली सांबिका रानावाके द्वारा भारत विरोधी जहर उगलना निदंनीय है ॥

 श्रीलंकाई संसद सदस्य अच्चिगे पटाली सांबिका रानावाके द्वारा भारत विरोधी जहर उगलना निदंनीय है ॥


उनके जैसे लोग श्रीलंका की अर्थव्यवस्था को बर्बाद करने के लिए भारत विरोधी मंच का इस्तेमाल कर रहे हैं।


By - अरुण उपाध्याय

 हिंदू संघर्ष समिति


 ये भारत से ही गये प्रवासी है मलयाली-तमिल का खून उनके वर्तमान वंश के अंदर गहराई से दौड़ता है। माता का वंश अच्छी मलयालम है और पिता का वंश पाटाली तमिल है वो अपनी राजनैतिक रोटियाँ सेंकने हेतु कट्टर सिंहली बौद्ध राजनीति के मुखौटा बनने को हमेशा लालायित रहे हैं, इसमें वो भूल गये है कि बौद्ध धर्म भी भारत से ही श्रीलंका गया है। एक तरह से वो चीन के प्यादे को तौर पर भारत विरोधी रूख अपनायें हुए हैं जबकि यह कटु सत्य है कि चीन ने ही श्रीलंका को बर्बाद किया है ।


 दो पीढ़ियों पहले केरल के एक प्रवासी, अब अदानी पर भारतीय एजेंट होने का आरोप लगा रहे हैं, उन्हें अतिरेकतापूर्वक श्रीलंका की संप्रभुता के लियें ख़तरा साबित करने पर तुले हुए है ।

संपिका राणावाके अपने नेता गोथबाया के चमचा बनना चाहते हैं। जबकि उन्हें अपने प्रयासों में इस्तीफ़ा देकर मुँह की खानी पड़ी है।


 जबकि उनके पूर्वज श्रीलंका के दक्षिण-पश्चिमी समुद्री तट पर केरल और तमिलनाडु से आयें प्रवासी थे, जो दालचीनी के व्यापारी के रूप में काम करते थे।  

इस व्यापार का आच्छी और पाताली दोनो प्रवासी समूह हिस्सा थे।


 जबकि भारतीय उद्योगपति अदानी प्रवासी नहीं हैं।  वह एक वैध और प्रतिष्ठित निवेशक है जो बिजली पैदा करने में वैकल्पिक ऊर्जा (सौर और पवन) स्रोतों को बढ़ावा देने की कोशिश कर रहे है।  इन क्षेत्रों में उनकी सफलता ने उन्हें भारत में एक जीवित किंवदंती बना दिया है।


 सौर और पवन ऊर्जा पर निर्भरता के लिए बिजली पैदा करने के लिए जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता से उत्तरोत्तर बदलने के श्रीलंका के आग्रह के बारे में सुनने के बाद, अदानी ने अपने भारतीय अनुभव को साझा करने की पेशकश की और उनका अनुभव व निवेश श्रीलंका के लिये एक वरदान सरीखा है ॥


 सनद रहे कि एक वैकल्पिक ऊर्जा खोज की ओर यह आग्रह जथिका हेला उरुमैया के चुनावी घोषणापत्र का हिस्सा था, जो कट्टरपंथी जनता मिथुरो (1992) की एक शाखा थी, जो तमिल विरोधी, भारतीय-विरोधी सिंहल उरुमाया (1998) में बदल गई।  राजनीतिक दल जथिका हेला उरुमैया, 2007।


 अदानी और संपिका दोनों भारतीय उपमहाद्वीप से हैं जिसकी आत्मा एक है और वैकल्पिक ऊर्जा स्रोत खोजने में उनकी समान रुचि है।  वे अभी श्रीलंका में हैं।  हालांकि, संपिका अडानी पर श्रीलंका की संप्रभुता के उल्लंघन का आरोप लगा रहे हैं जो कि ना केवल अनुचित है बल्कि संप्रदायिक कट्टरता के कारण पूर्वाग्रह ग्रस्त भी है ॥


 जबकि ये ही सज्जन हमेशा चीन के पिछलग्गू और ये कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि भाड़े के टट्टू है। जब हंबनटोटा बंदरगाह परियोजना चीन को सौंपी गई थी, अच्छीगे पाताली सांबिका रानावाके श्रीलंकाई सरकार की पार्टी का हिस्सा थीं।  कोई टेंडर प्रक्रिया नहीं थी।  यह सरकार से सरकार का सौदा था।  परियोजना को अनुबंधित करने में चीनी सरकार ने अपने सबसे अनुभवी व्यापारिक घरानों में से एक का समर्थन किया और बाद में यह परियोजना श्रीलंका के लिये ना केवल सफ़ेद हाथी साबित हुई वरन यहॉं से श्रीलंका की अर्थव्यवस्था के पतन का एक महत्वपूर्ण मोड़ शुरू हुआ फिर भी जब उनके जैसे लोग ग़ैरों पर करम और अपनों पर सितम करते हैं तो उनकी बुध्दि पर तरस आता है ॥


 चीन जब श्रीलंका को अपने क़र्ज़े के जाल में फसा रहा था तो अच्छेगे पाताली सांबिका रानावाके कभी नहीं रोए ना चिल्लायें 

अब जब भारत मानवीयता के आधार पर एक सच्चे मित्र की तरह व्यावहार कर रहा है तो उनके पेट में मरोड़ उठ रही है 

शानदार अकादमिक पृष्ठभूमि के साथ, वह श्रीलंका की संप्रभुता पर चीनी उल्लंघन के निहितार्थों को जानते थे।  वह चुप रहे, इसलिए नहीं कि कोई उल्लंघन नहीं हुआ था, बल्कि इसलिए कि यह उनके भारत-विरोधी राजनीतिक चेहरे के मुखौटे के अनुकूल था।


 चीन ने हंबनटोटा बंदरगाह को 99 साल के पट्टे पर हासिल किया था, जब यह वही श्रीलंकाई संप्रभुता कीमत पर सरकार में एक मंत्री थे जिसने पट्टा समझौते पर हस्ताक्षर किए थे।


 इसके अलावा इन्होंने चीन द्वारा वित्तपोषित कोलंबो बंदरगाह शहर समझौते पर चीन के साथ हस्ताक्षर किए गए थे जब यह बेशर्म "श्रीलंकाई संप्रभुता के रक्षक” सरकार में एक मंत्री थे जिन्होंने समझौते पर हस्ताक्षर किए थे।  शहरी विकास मंत्री के रूप में, उन्होंने कोलंबो शहर में चीनी निवेशकों को "प्रमुख मूल्यवान" भूमि के बड़े हिस्से को कौड़ियों के दाम पर दे दिया था ।


 तथाकथित और स्वयंभू “श्रीलंकाई संप्रभुता रक्षक “ भारतीय मूल के श्रीलंकाई संसद सदस्य अच्चिगे पटाली सांबिका रानावाके ने कभी चीन के विरूद्ध एक शब्द नहीं बोला, ना ही अन्य विदेशी देशों के खिलाफ उन्होंने ज़ुबान नहीं खोली हाल ही मे जब उचचिमुनाई द्वीप, कल्पितिया के तट पर 14 द्वीपों में से दूसरा सबसे बड़ा, श्रीलंकाई उत्तर पश्चिमी के पुट्टलम  प्रांत को पिछले महीने (मई 2022) स्विट्जरलैंड की एक कंपनी को 30 साल के लिए लीज पर दिया गया था तो वो बिल्कुल ख़ामोश  थे ।


 अच्छे पाताली सांबिका रानावाके भारतीय विरोधी हैं, और तमिल विरोधी विचारधारा के कारण नहीं हैं, बल्कि इसलिए कि वह अपनी हाल की भारतीय मूल की साख को छिपाना चाहते हैं।  उनका सिंहली बौद्ध चेहरा मुखौटा उनकी 'महत्वाकांक्षा', शक्ति और सफलता और सत्ता के लिए उनकी वासना के कारण है।


 ब्रिटिश श्रीलंका के बाद के 74 वर्षों में कई ऐसे नस्लवादी सिंहल बौद्ध राजनेताओं को सत्ता में और सत्ता से बाहर देखा गया था।  उनके निरंतर गलत स्थान पर रहने वाले जातीय-धार्मिक उग्रवाद ने श्रीलंका को उसके वर्तमान आर्थिक विनाश की ओर धकेल दिया है।


 1971 में, प्रधान मंत्री श्रीमावो भंडारनायके और मंत्री टी.बी. इलंगरत्ने ने कोलंबो में 22 भारतीय स्वामित्व वाले व्यापारिक प्रतिष्ठानों को श्रीलंकाई संप्रभुता के प्रतिकूल के रूप में पहचाना।


 कुछ साल बाद, कोलंबो में सबसे सफल भारतीय अपोलो अस्पतालों को अपना अस्पताल श्रीलंकाई निवेशकों को बेचने के लिए मजबूर होना पड़ा।


 भारतीय कोयंबटूर स्थित लक्ष्मी मिल्स, जिसने बीमार श्रीलंकाई वीविंग कॉरपोरेशन का पुनर्वास किया था, को बेवजह बाहर कर दिया गया था।


 मन्नार और पूनेरियन उत्तरी प्रांत में हैं, जो हिंदू तमिलों की पारंपरिक मातृभूमि है।  जातीय-धार्मिक केंद्रित सिंहली बौद्ध राजनेता हिंदू तमिल प्रांतों में किसी भी विकास का विरोध करते हैं।


 अडानी के निवेश को श्रीलंकाई संप्रभुता का उल्लंघन बताते हुए, अच्चिगे पाताली सांबिका राणावाके एक तीर से दो पक्षियों, भारत और हिंदू तमिलों को गोली मारने का प्रयास कर रहे हैं।


 पिछले 74 वर्षों से श्रीलंका का भारत का तुष्टिकरण तुरंत बंद होना चाहिए।  तमिल हिंदू प्रांत की स्थापना के लिए 1987 के राजीव-जयवर्धने समझौते को लागू करना श्रीलंका को आगे किसी भी समर्थन के लिए एक पूर्व शर्त होनी चाहिए।


 तमिल हिंदू जो अपने उत्तरी पड़ोसी भारत से प्यार और सम्मान करते हैं, उन्हें भारत द्वारा अपने दक्षिणी पड़ोसी के जातीय-धार्मिक चरमपंथियों से बचाया जाना चाहिए।


 एक आत्मनिर्भर, आत्मनिर्भर, 25000 वर्ग कि.मी.  क्षेत्र हिंदू तमिल प्रांत, भारत द्वारा अपनी प्रांतीय स्थिति निरंतरता का आश्वासन दिया, भारत के लिए अपनी दक्षिणी सीमाओं को सुरक्षित रखने और हिंद महासागर में उनके शिपिंग लेन - मार्गों को सुरक्षित रखने का एकमात्र तरीका है।

Thursday, March 25, 2021

Stop Brutal Atrocities on Bangladeshi Hindus Hindu Struggle Committee

Today, at the Kolkata Press Club, the Hindu Sangharsh Samiti and Bangladesh Udabastu Unnayan Sansad demonstrated a protest against the atrocities on Hindus in Bangladesh. 
Both organizations were also very angry with the humiliating demonstrations against our honorable Prime Minister Shri Narendra Modi’s visit to Bangladesh tomorrow and they expressed surprise at the anti-India tone of these protests.
They were also quite surprised by the Bangladeshi foreign minister shamelessly denying the atrocities on Hindus and all the leaders described it as a culmination of shamelessness.
On this occasion, the International President of the Hindu Sangharsh Samiti, Mr. Arun Upadhyay said, “First of all, I congratulate the global leader Narendra Modi for his visit to Bangladesh.
At the same time, I also congratulate him that Prime Minister Modi will visit the holy temples of "Matua" community in Gopalganj, Tungipara and Bangabandhu memorial in Oarkandi. His visit to the Tungipura temple will bring hope to the oppressed and suppressed Hindus.
I appeal to Modi ji that he should speak on the atrocities on minorities and ethnic massacres of Hindus in bilateral talks.
India had a very significant contribution to the rise and development of Bangladesh.
We will have to make efforts to ensure healthy democracy and human rights of minorities, so that our beloved neighbor Bangladesh does not become another Pakistan "
Protester were raising slogans Sheikh Hasina Shame - Stop Atrocities against Hindus ,  Bangladesh stop breaking my temples, Modi ji raise the voice of Hindus - we are with you.
On this occasion, the hostess of the program, Ms. Deeksha Kaushik, while addressing the media said that I am delighted with the news of Hon'ble Prime Minister Narendra Modi visiting Bangladesh on March 26, the special thing is that Prime Minister Modi will go the sacred temples of “Matua” community Tungipara, in Gopalganj and Bangabandhu memorial in Orakandi.
 I believe that this is a very revolutionary step of Modi ji. Hindu society, which is constantly suffering from a barbaric and inhuman communal atrocity, will get some hope from this step of Modi ji but drowning has many times to support the straws too.
At least Modi ji dared so much but I would like to say with great respect that this is inadequate.
The news on that is that even before Modi ji left for there some people have started opposing his visit.
But Bangladesh Foreign Minister AK Abdul Momen said on Saturday that there is no reason for a group of people to be worried about this protest.
He said, "Some people are campaigning against Indian Prime Minister Narendra Modi's visit to Dhaka but there is nothing to worry about. Bangladesh is a democratic country, where people have freedom of expression."
There have been protests in Bangladesh over the CAA and NRC. On Citizenship Amendment Act, Amit Shah had spoken about the oppression of Hindus in Bangladesh. Bangladesh had raised a strong objection regarding this.
Bangladesh Foreign Minister Abdul Momen had said, "Those who are saying about the persecution of Hindus is non-essential and false." There are few countries all over the world where there is communal harmony like Bangladesh. We do not have any minority here. We are all equal. As a neighboring country, we hope that India will not do anything that will spoil our friendly relations. This issue has come up before us recently. We will read it carefully and then raise this issue with India. "
Amazingly, Bangladesh had always been a beneficiary in India-Bangladesh bilateral relations and has gone to the extent of indirectly blackmailing diplomatically.
It has often not only in bilateral relations and have nurtured only their own interests, but they have not failed to keep Indian interests at bay.
What is it, that we are not able to tell them that when you are so democratic and transparent,  then why are you so intolerant towards the minority community of Bangladesh…
Why do you want to shamelessly denounce the ethnic massacre of people of Hindu, Buddhist and Christian community, but their daily falling dead body  is a direct proof that you do not hear their screams.
I am also unhappy with the disrespect of the Indian Prime Minister's photograph during a demonstration by Islamic and leftist organizations, India's contribution to the rise and development of Bangladesh had been most notable and his behavior reflects gratitude.
I appeal to the Indian Prime Minister, please break the silence and raise the issue of ethnic massacre of minorities, especially Hindus, in bilateral talks.
You have to tell the truth with perseverance, because this is in tune with our values and foreign policy and national interest.

On this occasion Bangladesh Udabandhu Unnayan Sansad leader Vimal Mazumdar, student leaders Amrit Mukherjee and Sumona Ghosh and President of West Bengal Hindu Sangharsh Samiti, Sandeep Jana were present.
#savebangladeshihindu
#Hindustrugglecommittee

भारत को बांग्लादेश में स्वस्थ लोकतंत्र, मानवाधिकार व सांप्रदायिक सौहार्द सुनिश्चित करना चाहिये ।

आज कोलकाता प्रेस क्लब में हिन्दू संघर्ष समिति व बांग्लादेश उदबस्तु उन्नयन संसद ने 
बांग्लादेश में हो रहे हिन्दुओ पर अत्याचार के विरोध में प्रदर्शन किया ।
दोनों संगठनों कल बांग्लादेश जा रहे हमारे माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के विरूद्ध हो रहे अपमानजनक प्रदर्शनों से भी ख़ासे नाराज़ नज़र आये उन्होंने इन विरोध प्रदर्शनों के भारत विरोधी सुर पर खासी हैरानी जताई.
वो बांग्लादेशी विदेश मंत्री द्वारा बड़े बेशर्मी से हिन्दुओ पर हो रहे अत्याचारों को सिरे से नकारने पर भी काफ़ी हैरान थे और सभी नेताओं ने इसे एक सुर में बेशर्मी की पराकाष्ठा बताया ।
इस अवसर पर हिन्दू संघर्ष समिति के अंतराष्ट्रीय अध्यक्ष श्री अरूण उपाध्याय ने कहा “मैं सबसे पहले तो वैश्विक नेता नरेन्द्र मोदी जी के बांग्लादेश दौरे पर जाने के लिये उन्हें शुभकामनायें देता हूँ 
साथ में मैं उनका बहुत बहुत अभिनंदन भी करता हूँ कि प्रधानमंत्री मोदी गोपालगंज में "मटुआ" समुदाय के पवित्र मंदिर तुंगीपारा और ओरकांडी में बंगबंधु स्मारक जाएंगे.
उनके तुंगीपुरा मंदिर जाने से वहॉं के दमित उत्पीडित और त्रस्त हिन्दूओ में एक आशा का संचार होगा ।
मेरी मोदी जी से अपील है कि वो द्विपक्षीय बातचीत में वहॉं के अल्पसंख्यकों पर हो रहे अत्याचार और हिन्दूओ के जातीय नरसंहार पर अपनी बात रखे ।
भारत का बांग्लादेश के अभ्युदय और विकास में बहुत ही उल्लेखनीय योगदान रहा है ।
हमें वहॉं स्वस्थ लोकतंत्र व अल्पसंख्यकों के मानवाधिकारों को सुनिश्चित करने हेतु प्रयास करने होंगे ताकि हमारा प्यारा पड़ोसी बांग्लादेश दूसरा पाकिस्तान ना बन जायें “
प्रदर्शनकारी शेख़ हसीना शर्म करो - हिन्दूओ पर अत्याचार बंद करो
बंग्लादेश मेरे मंदिर तोड़ना बंद करो
मोदी जी हिन्दुओ की आवाज़ उठाओ - हम आपके साथ है
के नारे लगा रहे थे ।
इस अवसर पर कार्यक्रम की संयोजिका सुश्री दीक्षा कौशिक ने मीडिया को संबोधित करते हुये कहा कि मै माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के परसो 26 मार्च को बांग्लादेश दौरे पर जाने के समाचार से हर्षित हूँ विशेष बात ये है कि प्रधानमंत्री मोदी गोपालगंज में "मटुआ" समुदाय के पवित्र मंदिर तुंगीपारा और ओरकांडी में बंगबंधु स्मारक जाएंगे. मेरा मानना है कि ये मोदी जी का एक बहुत बड़ा क्रान्तिकारी कदम  है । वहॉं का हिन्दू समाज जो लगातार एक बर्बर और अमानवीय सांप्रदायिक अत्याचार से पीड़ित है वो मोदी जी के इस कदम से थोड़ी सी आशा पायेगा पर डूबते को कई बार तिनके का सहारा भी बहुत होता है ।
कम से कम मोदी जी ने इतनी हिम्मत तो की पर मैं बहुत सम्मान के साथ कहना चाहंूगी कि ये नाकाफ़ी है । 
उस पर खबर ये है कि मोदी जी के वहॉं जाने से पहले ही वहाँ कुछ लोगों ने उनके दौरे का विरोध शुरू कर दिया है.
लेकिन बांग्लादेश के विदेश मंत्री एके अब्दुल मोमेन ने शनिवार को कहा कि लोगों के एक समूह के इस विरोध से चिंतित होने की कोई वजह नहीं है.
उन्होंने कहा, "कुछ लोग भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ढाका दौरे के ख़िलाफ़ अभियान चला रहे हैं लेकिन कोई चिंता की बात नहीं है. बांग्लादेश एक लोकतांत्रिक देश है, जहाँ लोगों को अभिव्यक्ति की आज़ादी है.
सीएए और एनआरसी को लेकर बांग्लादेश में विरोध होता रहा है. सीएए यानी नागरिकता संशोधन क़ानून के तर्क में अमित शाह ने बांग्लादेश में हिन्दुओ के उत्पीड़न की बात कही थी. इसे लेकर बांग्लादेश ने कड़ी आपत्ति जताई थी.
बांग्लादेश के विदेश मंत्री अब्दुल मोमेन ने कहा था, ''जो वे हिंदुओं के उत्पीड़न की बात कह रहे हैं, वो ग़ैर-ज़रूरी और झूठ है. पूरी दुनिया में ऐसे देश कम ही हैं जहां बांग्लादेश के जैसा सांप्रदायिक सौहार्द है. हमारे यहां कोई अल्पसंख्यक नहीं है. हम सब बराबर हैं. एक पड़ोसी देश के नाते, हमें उम्मीद है कि भारत ऐसा कुछ नहीं करेगा जिससे हमारे दोस्ताना संबंध ख़राब हों. ये मसला हमारे सामने हाल ही में आया है. हम इसे ध्यान से पढ़ेंगे और उसके बाद भारत के साथ ये मुद्दा उठाएंगे."
कमाल की बात है कि भारत बांग्लादेश द्विपक्षीय संबंधों में बांग्लादेश हमेशा लाभार्थी रहा है और कूटनीतिक रूप में अप्रत्यक्ष रूप से ब्लैकमेल करने की हद तक गया है ।
उन्होंने बहुत बार द्विपक्षीय संबंधों में ना केवल 
और केवल अपने हितों को पोषित किया है वरन वो भारतीय हितों को ताक पर रखने से भी नहीं चूके ।
क्या बात है कि हम उनसे ये नहीं कह पा रहे कि जब आप इतने ही लोकतांत्रिक और पारदर्शी हो तो बॉंग्लादेश के अल्पसंख्यक समुदाय के प्रति इतने असहिष्णु क्यूँ हो ...
क्यूँ आप हिन्दू , बौद्ध और ईसाई समुदाय के लोगों के जातीय नरसंहार को बेशर्मी से झूठ बोलकर झुठलाना चाहते है पर उनकी रोज़ रोज़ गिरती लाशे प्रत्यक्ष प्रमाण है क्या आपको उनकी चीखें नहीं सुनाई देती ।
मै वहॉं के इस्लामिक और वामपंथी संगठनो द्वारा प्रदर्शन के दौरान भारतीय प्रधानमंत्री की तस्वीर के अनादर से भी नाखुश हूँ , भारत का योगदान बांग्लादेश के अभ्युदय और विकास में सबसे ज़्यादा उल्लेखनीय रहा है और उनका ये व्यावहार कृतघ्नता को दर्शाता है ।
मेरी भारतीय प्रधानमंत्री से अपील है कृपया चुप्पी तोड़े और वहॉं अल्पसंख्यकों विशेषकर हिन्दूओ के जातीय नरसंहार का मुद्दा द्विपक्षीय बातचीत में उठाये ।
आपको दृढ़ता के साथ सच बोलना ही होगा 
क्योंकि यही हमारे मूल्यों व विदेश नीति तथा राष्ट्रीय हित के अनूकूल है ।

इस अवसर पर बांग्लादेश उदबस्तु उन्नयन संसद के नेता विमल मजूमदार , छात्र नेता अमृत मुखर्जी व सुमोना घोष व पश्चिम बंगाल हिन्दू संघर्ष समिति के अध्यक्ष संदीप जना मौजूद रहे

Saturday, February 8, 2014

भारतीय दर्शन


तत्त्वों के अन्वेषण की प्रवृत्ति भारतवर्ष में उस सुदूर काल से है, जिसे हम 'वैदिक युग' के नाम से पुकारते हैं। ऋग्वेद के अत्यन्त प्राचीन
युग से ही भारतीय विचारों में द्विविध प्रवृत्ति और द्विविध लक्ष्य के दर्शन हमें होते हैं। प्रथम प्रवृत्ति प्रतिभा या प्रज्ञामूलक है तथा 
द्वितीय प्रवृत्ति तर्कमूलक है। प्रज्ञा के बल से ही पहली प्रवृत्ति तत्त्वों के विवेचन में कृतकार्य होती है और दूसरी प्रवृत्ति तर्क के सहारे 
तत्त्वों के समीक्षण में समर्थ होती है। अंग्रेजी शब्दों में पहली की हम ‘इन्टयूशनिस्टिक’ कह सकते हैं और दूसरी को रैशनलिस्टिक। लक्ष्य 
भी आरम्भ से ही दो प्रकार के थे-धन का उपार्जन तथा ब्रह्म का साक्षात्कार।
प्रज्ञामूलक और तर्क-मूलक प्रवृत्तियों के परस्पर सम्मिलन से आत्मा के औपनिषदिष्ठ तत्त्वज्ञान का स्फुट आविर्भाव हुआ। उपनिषदों 
के ज्ञान का पर्यवसान आत्मा और परमात्मा के एकीकरण को सिद्ध करने वाले प्रतिभामूलक वेदान्त में हुआ।
भारतीय मनीषियों के उर्वर मस्तिष्क से जिस कर्म, ज्ञान और भक्तिमय त्रिपथगा का प्रवाह उद्भूत हुआ, उसने दूर-दूर के मानवों के
 आध्यात्मिक कल्मष को धोकर उन्हेंने पवित्र, नित्य-शुद्ध-बुद्ध और सदा स्वच्छ बनाकर मानवता के विकास में योगदान दिया है। इसी 
पतितपावनी धारा को लोग दर्शन के नाम से पुकारते हैं। अन्वेषकों का विचार है कि इस शब्द का वर्तमान अर्थ में सबसे पहला प्रयोग
 वैशेषिक दर्शन में हुआ।

‘दर्शन’ शब्द का अर्थ

'दर्शन' शब्द पाणिनीय व्याकरण के अनुसार 'दृशिर् प्रेक्षणे' धातु से ल्युट् प्रत्यय करने से निष्पन्न होता है। अतएव दर्शन शब्द का अर्थ 
दृष्टि या देखना, ‘जिसके द्वारा देखा जाय’ या ‘जिसमें देखा जाय’ होगा। दर्शन शब्द का शब्दार्थ केवल देखना या सामान्य देखना ही 
नहीं है। इसीलिए पाणिनी ने धात्वर्थ में ‘प्रेक्षण’ शब्द का प्रयोग किया है। प्रकृष्ट ईक्षण, जिसमें अन्तश्चक्षुओं द्वारा देखना या मनन
 करके सोपपत्तिक निष्कर्ष निकालना ही दर्शन का अभिधेय है। इस प्रकार के प्रकृष्ट ईक्षण के साधन और फल दोनों का नाम दर्शन है। 
जहाँ पर इन सिद्धान्तों का संकलन हो, उन ग्रन्थों का भी नाम दर्शन ही होगा, जैसे-न्याय दर्शन, वैशेषिक दर्शन मीमांसा दर्शन आदि-आदि।
दर्शन ग्रन्थों को दर्शनशास्त्र भी कहते हैं। यह शास्त्र शब्द ‘शासु अनुशिष्टौ’ से निष्पन्न होने के कारण दर्शन का अनुशासन या उपदेश करने
 के कारण ही दर्शन-शास्त्र कहलाने का अधिकारी है। दर्शन अर्थात् साक्षात्कृत धर्मा ऋषियों के उपदेशक ग्रन्थों का नाम ही दर्शन शास्त्र है।

भारतीय दर्शन का प्रतिपाद्य विषय

दर्शनों का उपदेश वैयक्तिक जीवन के सम्मार्जन और परिष्करण के लिए ही अधिक उपयोगी है। आध्यात्मिक पवित्रता एवं उन्नयन, 
बिना दर्शनों को होना दुर्लभ है। दर्शन-शास्त्र ही हमें प्रमाण और तर्क के सहारे अन्धकार में दीपज्योति प्रदान करके हमारा मार्ग-दर्शन करने
 में समर्थ होता है। गीता के अनुसार किं कर्म किमकर्मेति कवयोऽप्यत्र मोहिता: (संसार में करणीय क्या है और अकरणीय क्या है ? 
इस विषय में विद्वान भी अच्छी तरह नहीं जान पाते।) परम लक्ष्य एवं पुरुषार्थ की प्राप्ति दार्शनिक ज्ञान से ही संभव है, अन्यथा नहीं।
दर्शन द्वारा विषयों को हम संक्षेप में दो वर्गों में रख सकते हैं। लौकिक और अलौकिक अथवा भौतिक और आध्यात्मिक। दर्शन या तो 
विस्तृत सृष्टि प्रपंच के विषय में सिद्धान्त या आत्मा के विषय में हमसे चर्चा करता है। इस प्रकार दर्शन के विषय जड़ और चेतन दोनों 
ही हैं। प्राचीन ऋग्वैदिक काल से ही दर्शनों के मूल तत्त्वों के विषय में कुछ न कुछ संकेत हमारे आर्ष साहित्य में मिलते हैं।

भारतीय दर्शन की विकास यात्रा

वेदों में जो आधार तत्त्व बीज रूप में बिखरे दिखाई पड़ते थे, वे ब्राह्मणों में आकर कुछ उभरे; परन्तु वहाँ कर्मकाण्ड की लताओं के
 प्रतानों में फँसकर बहुत अधिक नहीं बढ़ पाये। आरण्यकों में ये अंकुरित होकर उपनिषदों में खूब पल्लवित हुए। दर्शनों का विकास जो 
हमें उपनिषदों में हमें दृष्टिगोचर होता है, आलोचकों ने उसका श्रीगणेश लगभग दौ सौ वर्ष ईसा पूर्व स्थिर किया है। महात्मा बुद्ध से यह 
प्राचीन हैं। इतना ही नहीं विद्वानों ने सांख्ययोग और मीमांसा को भी बुद्ध से प्राचीन माना है। संभव है कि ये दर्शन वर्तमान रूप में उस 
समय न हों, तथापि वे किसी रूप में अवश्य विद्यमान थे। वैशेषिकदर्शन भी शायद बुद्ध से प्राचीन ही है; क्योंकि जैसा आज के युग में 
न्याय और वैशेषिक समान तन्त्र समझे जाते हैं, उसी प्रकार पहले पूर्व मीमांस और वैशेषिक समझे जाते थे। बौद्धदर्शन पद्धति का 
आविर्भाव 
ईसा से पूर्व दो सौ वर्ष माना जाता है, परन्तु जैन दर्शनबौद्ध दर्शन से भी प्राचीन ठहरता है। इसकी पुष्टि में यह प्रमाण दिया जाता है कि प्राचीन
 जैन दर्शनों में न तो बुद्ध दर्शन और न किसी हिन्दू दर्शन का ही खण्डन उपलब्ध होता है। महावीर स्वामी, जो जैन सम्प्रदाय के 
प्रवर्तक माने जाते हैं, वे भी बुद्ध से प्राचीन थे। अतएव जैन दर्शन का बुद्ध दर्शन से प्राचीन होना युक्तियुक्त अनुमान है।
भारतीय दर्शनों का ऐतिहासिक क्रम निश्चित करना कठिन है। इन सब भिन्न-भिन्न दर्शनों का लगभग साथ ही साथ समान रूप से 
प्रादुर्भाव एवं विकास हुआ है। इधर-उधर तथा बीच में भी कई कड़ियाँ छिन्न-भिन्न हो गई हैं। अत: जो कुछ शेष है, उसी का आधार लेकर
 चलना है। इस क्रम में शुद्ध ऐतिहासिकता न होने पर भी क्रमिक विकास की श्रृंखला आदि से अन्त तक चलती रही है। इसलिए 
प्राय: विद्वानों ने इसी क्रम का अनुसरण किया है।

भारतीय दर्शन का स्रोत

भारतीय दर्शन का आरंभ वेदों से होता है। "वेद" भारतीय धर्म, दर्शन, संस्कृति, साहित्य आदि सभी के मूल स्रोत हैं। आज भी धार्मिक
 और सांस्कृतिक कृत्यों के अवसर पर वेद-मंत्रों का गायन होता है। अनेक दर्शन-संप्रदाय वेदों को अपना आधार और प्रमाण मानते हैं।
 आधुनिक अर्थ में वेदों को हम दर्शन के ग्रंथ नहीं कह सकते। वे प्राचीन भारतवासियों के संगीतमय काव्य के संकलन है। उनमें उस
 समय के भारतीय जीवन के अनेक विषयों का समावेश है। वेदों के इन गीतों में अनेक प्रकार के दार्शनिक विचार भी मिलते हैं। चिंतन
 के इन्हीं बीजों से उत्तरकालीन दर्शनों की वनराजियाँ विकसित हुई हैं। अधिकांश भारतीय दर्शन वेदों को अपना आदिस्त्रोत मानते हैं।
 ये "आस्तिक दर्शन" कहलाते हैं। प्रसिद्ध षड्दर्शन इन्हीं के अंतर्गत हैं। जो दर्शनसंप्रदाय अपने को वैदिक परंपरा से स्वतंत्र मानते हैं वे
 भी कुछ सीमा तक वैदिक विचारधाराओं से प्रभावित हैं।
वेदों का रचनाकाल बहुत विवादग्रस्त है। प्राय: पश्चिमी विद्वानों ने ऋग्वेद का रचनाकाल 1500 ई.पू. से लेकर 2500 ई.पू. तक
 माना है। इसके विपरीत भारतीय विद्वान् ज्योतिष आदि के प्रमाणों द्वारा ऋग्वेद का समय 3000 ई.पू. से लेकर 75000 वर्ष 
ई.पू. तक मानते हैं। इतिहास की विदित गतियों के आधार पर इन प्राचीन रचनाओं के समय का अनुमान करना कठिन है। प्राचीन काल
 में इतने विशाल और समृद्ध साहित्य के विकास में हजारों वर्ष लगे होंगे, इसमें कोई संदेह नहीं। उपलब्ध वैदिक साहित्य संपूर्ण वैदिक
 साहित्य का एक छोटा सा अंश है। प्राचीन युग में रचित समस्त साहित्य संकलित भी नहीं हो सका होगा और संकलित साहित्य का
 बहुत सा भाग आक्रमणकारियों ने नष्ट कर दिया होगा। वास्तविक वैदिक साहित्य का विस्तार इतना अधिक था कि उसके रचनाकाल
 की कल्पना करना कठिन है। निस्संदेह वह बहुत प्राचीन रहा होगा। वेदों के संबंध में यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि कुरान और
 बाइबिल की भाँति "वेद" किसी एक ग्रंथ का नाम नहीं है और न वे किसी एक मनुष्य की रचनाएँ हैं। "वेद" एक संपूर्ण साहित्य है
 जिसकी विशाल परंपरा है और जिसमें अनेक ग्रंथ सम्मिलित हैं। धार्मिक परंपरा में वेदों को नित्य, अपौरुषेय और ईश्वरीय माना 
जाता है। ऐतिहासिक दृष्टिकोण से हम उन्हें ऋषियों की रचना मान सकते हैं। वेदमंत्रों के रचनेवाले ऋषि अनेक हैं।
वैदिक साहित्य का विकास चार चरणों में हुआ है। ये संहिता, ब्राह्मण, आरण्यक और उपनिषद् कहलाते हैं। मंत्रों और स्तुतियों के संग्रह
 को "संहिता" कहते हैं। ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद मंत्रों की संहिताएँ ही हैं। इनकी भी अनेक शाखाएँ हैं। इन संहिताओं
 के मंत्र यज्ञ के अवसर पर देवताओं की स्तुति के लिए गाए जाते थे। आज भी धार्मिक और सांस्कृतिक कृत्यों के अवसर पर इनका
 गायन होता है। इन वेदमंत्रों में इंद्र, अग्नि, वरुण, सूर्य, सोम, उषा आदि देवताओं की संगीतमय स्तुतियाँ सुरक्षित हैं। यज्ञ और 
देवोपासना ही वैदिक धर्म का मूल रूप था। वेदों की भावना उत्तरकालीन दर्शनों के समान सन्यासप्रधन नहीं है। वेदमंत्रों में जीवन के
 प्रति आस्था तथा जीवन का उल्लास ओतप्रोत है। जगत् की असत्यता का वेदमंत्रों में आभास नहीं है। ऋग्वेद में लौकिक मूल्यों का
 पर्याप्त मान है। वैदिक ऋषि देवताओं से अन्न, धन, संतान, स्वास्थ्य, दीर्घायु, विजय आदि की अभ्यर्थना करते हैं।
वेदों के मंत्र प्राचीन भारतीयों के संगीतमय लोककाव्य के उत्तम उदाहरण हैं। ब्राह्मण, आरण्यक और उपनिषद् ग्रंथों में गद्य की 
प्रधानता है, यद्यपि उनका यह गद्य भी लययुक्त है। ब्राह्मण ग्रंथों में यज्ञों की विधि, उनके प्रयोजन, फल आदि का विवेचन है।
 आरण्यकग्रंथों में आध्यात्मिकता की ओर झुकाव दिखाई देता है। जैसा कि इस नाम से ही विदित होता है, ये वानप्रस्थों के उपयोग के
 ग्रंथ हैं। उपनिषदों में आध्यात्मिक चिंतन की प्रधानता है। चारों वेदों की मंत्रसंहिताओं के ब्राह्मण, आरण्यक और उपनिषद् अलग अलग
 मिलते हैं। शतपथ, तांडय आदि ब्राह्मण प्रसिद्ध और महत्वपूर्ण हैं। ऐतरेय, तैत्तिरीय आदि के नाम से आरण्यक और उपनिषद्
 दोनों मिलते हैं। इनके अतिरिक्त ईश, केन, कठ, प्रश्न, मुंडक, मांडूक्य आदि प्राचीन उपनिषद् भारतीय चिंतन के आदिस्त्रोत हैं।
उपनिषदों का दर्शन आध्यात्मिक है। ब्रह्म की साधना ही उपनिषदों का मुख्य लक्ष्य है। ब्रह्म को आत्मा भी कहते हैं। "आत्मा"
 विषयजगत्, शरीर, इंद्रियों, मन, बुद्धि आदि सभी अवगम्य तत्वों स परे एक अनिर्वचनीय और अतींद्रिय तत्व है, जो चित्स्वरूप,
 अनंत और आनंदमय है। सभी परिच्छेदों से परे होने के कारण वह अनंत है। अपरिच्छन्न और एक होने के कारण आत्मा भेदमूलक
 जगत् में मनुष्यों के बीच आंतरिक अभेद और अद्वैत का आधार बन सकता है। आत्मा ही मनुष्य का वास्तविक स्वरूप है। उसका
 साक्षात्कार करके मनुष्य मन के समस्त बंधनों से मुक्त हो जाता है। अद्वैतभाव की पूर्णता के लिए आत्मा अथवा ब्रह्म से जड़ जगत्
 की उत्पत्ति कैसे होती है, इसकी व्याख्या के लिए माया की अनिर्वचनीय शक्ति की कल्पना की गई है। किंतु सृष्टिवाद की अपेक्षा 
आत्मिक अद्वैतभाव उपनिषदों के वेदांत का अधिक महत्वपूर्ण पक्ष है। यही अद्वैतभाव भारतीय संस्कृति में ओतप्रोत है। दर्शन के
 क्षेत्र में उपनिषदों का यह ब्रह्मवाद आदि शंकराचार्यरामानुजाचार्य आदि के उत्तरकालीन वेदांत मतों का आधार बना। वेदों का अंतिम 
भाग होने के कारण उपनिषदों को "वेदांत" भी कहते हैं। उपनिषदों का अभिमत ही आगे चलकर वेदांत का सिद्धांत और संप्रदायों का
 आधार बन गया। उपनिषदों की शैली सरल और गंभीर है। अनुभव के गंभीर तत्व अत्यंत सरल भाषा में उपनिषदों में व्यक्त हुए हैं। 
उनको समझने के लिए अनुभव का प्रकाश अपेक्षित है। ब्रह्म का अनुभव ही उपनिषदों का लक्ष्य है। वह अपनी साधना से ही प्राप्त होता
 है। गुरु का संपर्क उसमें अधिक सहायक होता है। तप, आचार आदि साधना की भूमिका बनाते हैं। कर्म आत्मिक अनुभव का साधक नहीं
 है। कर्म प्रधान वैदिक धर्म से उपनिषदों का यह मतभेद है। सन्यास, वैराग्य, योग, तप, त्याग आदि को उपनिषदों में बहुत महत्व दिया
 गया है। इनमें श्रमण परंपरा के कठोर सन्यासवाद की प्रेरणा का स्रोत दिखाई देता है। तपोवादी जैन और बौद्ध मत तथा गीता का कर्मयोग
 उपनिषदों की आध्यात्मिक भूमि में ही अंकुरित हुए हैं।

हिन्दू दर्शन परंपरा

हिन्दू धर्म में दर्शन अत्यन्त प्राचीन परम्परा रही है। वैदिक दर्शनों में षड्दर्शन अधिक प्रसिद्ध और प्राचीन हैं। गीता का कर्मवाद भी
 इनके समकालीन है। षडदर्शनों को 'आस्तिक दर्शन' कहा जाता है। वे वेद की सत्ता को मानते हैं। हिन्दू दार्शनिक परम्परा में विभिन्न 
प्रकार के आस्तिक दर्शनों के अलावा अनीश्वरवादी और भौतिकवादी दार्शनिक परम्पराएँ भी विद्यमान रहीं हैं।

छह दर्शन

न्याय दर्शन

महर्षि गौतम रचित इस दर्शन में पदार्थों के तत्वज्ञान से मोक्ष प्राप्ति का वर्णन है। पदार्थों के तत्वज्ञान से मिथ्या ज्ञान की निवृत्ति होती 
है। फिर अशुभ कर्मो में प्रवृत्त न होना, मोह से मुक्ति एवं दुखों से निवृत्ति होती है। इसमें परमात्मा को सृष्टिकर्ता, निराकार, सर्वव्यापक 
और जीवात्मा को शरीर से अलग एवं प्रकृति को अचेतन तथा सृष्टि का उपादान कारण माना गया है और स्पष्ट रूप से त्रैतवाद का
 प्रतिपादन किया गया है। इसके अलावा इसमें न्याय की परिभाषा के अनुसार न्याय करने की पद्धति तथा उसमें जय-पराजय के कारणों
 का स्पष्ट निर्देश दिया गया है।

वैशेषिक दर्शन

महर्षि कणाद रचित इस दर्शन में धर्म के सच्चे स्वरूप का वर्णन किया गया है। इसमें सांसारिक उन्नति तथा निश्श्रेय सिद्धि के साधन को
 धर्म माना गया है। अत: मानव के कल्याण हेतु धर्म का अनुष्ठान करना परमावश्यक होता है। इस दर्शन में द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य
 विशेष और समवाय इन छ: पदाथों के साधम्र्य तथा वैधम्र्य के तत्वाधान से मोक्ष प्राप्ति मानी जाती है। साधम्र्य तथा वैधम्र्य ज्ञान की
 एक विशेष पद्धति है, जिसको जाने बिना भ्रांतियों का निराकरण करना संभव नहीं है। इसके अनुसार चार पैर होने से गाय-भैंस एक नहीं
 हो सकते। उसी प्रकार जीव और ब्रह्म दोनों ही चेतन हैं। किंतु इस साधम्र्य से दोनों एक नहीं हो सकते। साथ ही यह दर्शन वेदों को,
 ईश्वरोक्त होने को परम प्रमाण मानता है।

सांख्य दर्शन

इस दर्शन के रचयिता महर्षि कपिल हैं। इसमें सत्कार्यवाद के आधार पर इस सृष्टि का उपादान कारण प्रकृति को माना गया है। इसका 
प्रमुख सिद्धांत है कि अभाव से भाव या असत से सत की उत्पत्ति कदापि संभव नहीं है। सत कारणों से ही सत कार्यो की उत्पत्ति हो 
सकती है। सांख्य दर्शन प्रकृति से सृष्टि रचना और संहार के क्रम को विशेष रूप से मानता है। साथ ही इसमें प्रकृति के परम सूक्ष्म 
कारण तथा उसके सहित ख्ब् कार्य पदाथों का स्पष्ट वर्णन किया गया है। पुरुष ख्भ् वां तत्व माना गया है, जो प्रकृति का विकार नहीं है।
 इस प्रकार प्रकृति समस्त कार्य पदाथो का कारण तो है, परंतु प्रकृति का कारण कोई नहीं है, क्योंकि उसकी शाश्वत सत्ता है। पुरुष चेतन
 तत्व है, तो प्रकृति अचेतन। पुरुष प्रकृति का भोक्ता है, जबकि प्रकृति स्वयं भोक्ती नहीं है।

योग दर्शन

इस दर्शन के रचयिता महर्षि पतंजलि हैं। इसमें ईश्वर, जीवात्मा और प्रकृति का स्पष्ट रूप से वर्णन किया गया है। इसके अलावा योग
 क्या है, जीव के बंधन का कारण क्या है? चित्त की वृत्तियां कौन सी हैं? इसके नियंत्रण के क्या उपाय हैं इत्यादि यौगिक क्रियाओं का
 विस्तृत वर्णन किया गया है। इस सिद्धांत के अनुसार परमात्मा का ध्यान आंतरिक होता है। जब तक हमारी इंद्रियां बहिर्गामी हैं, तब
 तक ध्यान कदापि संभव नहीं है। इसके अनुसार परमात्मा के मुख्य नाम ओ३म् का जाप न करके अन्य नामों से परमात्मा की स्तुति 
और उपासना अपूर्ण 

मीमांसा दर्शन

इस दर्शन में वैदिक यज्ञों में मंत्रों का विनियोग तथा यज्ञों की प्रक्रियाओं का वर्णन किया गया है। इस दर्शन के रचयिता महर्षि जैमिनि हैं।
 यदि योग दर्शन अंत: करण शुçद्ध का उपाय बताता है, तो मीमांसा दर्शन मानव के पारिवारिक जीवन से राष्ट्रीय जीवन तक के कत्तüव्यों 
और अकत्तüव्यों का वर्णन करता है, जिससे समस्त राष्ट्र की उन्नति हो सके। जिस प्रकार संपूर्ण कर्मकांड मंत्रों के विनियोग पर आधारित

हैं, उसी प्रकार मीमांसा दर्शन भी मंत्रों के विनियोग और उसके विधान का समर्थन करता है। धर्म के लिए महर्षि जैमिनि ने वेद को भी परम
 प्रमाण माना है। उनके अनुसार यज्ञों में मंत्रों के विनियोग, श्रुति, वाक्य, प्रकरण, स्थान एवं समाख्या को मौलिक आधार माना जाता है।

वेदांत दर्शन

वेदांत का अर्थ है वेदों का अंतिम सिद्धांत। महर्षि व्यास द्वारा रचित ब्रह्मसूत्र इस दर्शन का मूल ग्रन्थ है। इस दर्शन को उत्तर मीमांसा 
भी कहते हैं। इस दर्शन के अनुसार ब्रह्म जगत का कर्ता-धर्ता व संहार कर्ता होने से जगत का निमित्त कारण है। उपादान अथवा अभिन्न
 कारण नहीं। ब्रह्म सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान, आनंदमय, नित्य, अनादि, अनंतादि गुण विशिष्ट शाश्वत सत्ता है। साथ ही जन्म मरण आदि
 क्लेशों से रहित और निराकार भी है। इस दर्शन के प्रथम सूत्र `अथातो ब्रह्म जिज्ञासा´ से ही स्पष्ट होता है कि जिसे जानने की इच्छा है,
 वह ब्रह्म से भिन्न है, अन्यथा स्वयं को ही जानने की इच्छा कैसे हो सकती है। और यह सर्वविदित है कि जीवात्मा हमेशा से ही अपने
 दुखों से मुक्ति का उपाय करती रही है। परंतु ब्रह्म का गुण इससे भिन्न है।
आगे चलकर वेदान्त के अनेकानेक सम्प्रदाय (अद्वैत, द्वैत, द्वैताद्वैत, विशिष्टाद्वैत आदि ) बने।

अन्य हिन्दू दर्श

षड दर्शनों के अलावा लोकायत तथा शैव एवं शाक्त दर्शन भी हिन्दू दर्शन के अभिन्न अंग हैं।

चार्वाक दर्शन

वेदविरोधी होने के कारण नास्तिक संप्रदायों में चार्वाक मत का भी नाम लिया जाता है। भौतिकवादी होने के कारण यह आदर न पा सका।
 इसका इतिहास और साहित्य भी उपलब्ध नहीं है। "बृहस्पति सूत्र" के नाम से एक चार्वाक ग्रंथ के उद्धरण अन्य दर्शन ग्रंथों में मिलते हैं।
 चार्वाक मत एक प्रकार का यथार्थवाद और भौतिकवाद है। इसके अनुसार केवल प्रत्यक्ष ही प्रमाण है। अनुमान और आगम संदिग्ध होते हैं।
 प्रत्यक्ष पर आश्रित भौतिक जगत् ही सत्य है। आत्मा, ईश्वर, स्वर्ग आदि सब कल्पित हैं। भूतों के संयोग से देह में चेतना उत्पन्न होती है
। देह के साथ मरण में उसका अंत हो जाता है। आत्मा नित्य नहीं है। उसका पुनर्जन्म नहीं होता। जीवनकाल में यथासंभव सुख की साधना
 करना ही जीवन का लक्ष्य होना चाहिए।

शैव और शाक्त संप्रदाय


अवैदिक दर्शनों का विकास

उपनिषदों के अध्यात्मवाद तथा तपोवाद में ही वैदिक कर्मकांड के विरुद्ध एक प्रकट क्रांति का रूप ग्रहण कर लिया। उपनिषद काल में
 एक ओर बौद्ध और जैन धर्मों की अवैदिक परंपराओं का आविर्भाव हुआ तथा दूसरी ओर वैदिक दर्शनों का उदय हुआ। ईसा के जन्म के
 पूर्व और बाद की एक दो शताब्दियों में अनेक दर्शनों की समानांतर धाराएँ भारतीय विचारभूमि पर प्रवाहित होने लगीं। बौद्ध और जैन
 दर्शनों की धाराएँ भी इनमें सम्मिलित हैं।
जैन धर्म का आरंभ बौद्ध धर्म से पहले हुआ। महावीर स्वामी के पूर्व 23 जैन तीर्थकर हो चुके थे। महावीर स्वमी ने जैन धर्म का प्रचार 
किया। बौद्ध धर्म के प्रवर्तक गौतम बुद्ध उनके समकालीन थे। दोनों का समय ई.पू. छठी शताब्दी माना जाता है। इन्होंने वेदों से स्वतंत्र 
एक नवीन धार्मिक परंपरा का प्रवर्तन किया। वेदों को न मानने के कारण जैन और बौद्ध दर्शनों को "नास्तिक दर्शन" भी
 कहते हैं। इनका मौलिक साहित्य क्रमश: महावीर और बुद्ध के उपदेशों के रूप मे है जो क्रमश: प्राकृत और पालि की लोकभाषाओं में
 मिलता है तथा जिसका संग्रह इन महापुरुषों के निर्वाण के बाद कई संगीतियों में उनके अनुयायियों के परामर्श के द्वारा हुआ। बुद्ध और
 महावीर दोनों हिमालय प्रदेश के राजकुमार थे। युवावय में ही सन्यास लेकर उन्होने अपने धर्मो का उपदेश और प्रचार किया। उनका यह
 सन्यास उपनिषदों की परंपरा से प्रेरित है। जैन और बौद्ध धर्मों में तप और त्याग की महिमा भी उपनिषदों के दशर्न के अनुकूल है।
 अहिंसा और आचार की महत्ता तथा जातिभेद का खंडन इन धर्मों की विशेषता है। अहिंसा के बीज भी उपनिषदों में विद्यमान हैं।
 फिर भी अहिंसा की ध्वजा को धर्म के आकाश में फहराने का श्रेय जैन और बौद्ध संप्रदायों को देना होगा।

जैन दर्शन

महावीर स्वामी के उपदेशों से लेकर जैन धर्म की परंपरा आज तक चल रही है। महावीर स्वामी के उपदेश 41 सूत्रों में संकलित हैं, जो
 जैनागमों में मिलते हैं। उमास्वाति का "तत्वार्थाधिगम सूत्र" (300 ई.) जैन दर्शन का प्राचीन और प्रामाणिक शास्त्र है। सिद्धसेन दिवाकर
 (500 ई.), हरिभद्र (900 ई.), मेरुतुंग (14वीं शताब्दी), आदि जैन दर्शन के प्रसिद्ध आचार्य हैं। सिद्धांत की दृष्टि से जैन दर्शन एक ओर
 अध्यात्मवादी तथा दसरी ओर भौतिकवादी है। वह आत्मा और पुद्गल (भौतिक तत्व) दोनों को मानता है। जैन मत में आत्मा प्रकाश
 के समान व्यापक और विस्तारशील है। पुनर्जन्म में नवीन शरीर के अनुसार आत्मा का संकोच और विस्तार होता है। स्वरूप से वह
 चैतन्य स्वरूप और आनंदमय है। वह मन और इंद्रियों के माध्यम के बिना परोक्ष विषयों के ज्ञान में समर्थ है। इस अलौकिक ज्ञान 
के तीन रूप हैं - अवधिज्ञान, मन:पर्याय और केवलज्ञान। पूर्ण ज्ञान को केवलज्ञान कहते हैं। यह निर्वाण की अवस्था में प्राप्त हाता है। 
यह सब प्रकार से वस्तुओं के समस्त धर्मों का ज्ञान है। यही ज्ञान "प्रमाण" है। किसी अपेक्षा से वस्तु के एक धर्म का ज्ञान "नय"
 कहलाता है। "नय" कई प्रकार के होते हैं। ज्ञान की सापेक्षता जैन दर्शन का सिद्धांत है। यह सापेक्षता मानवीय विचारों में उदारता 
और सहिष्णुता को संभव बनाती है। सभी विचार और विश्वास आंशिक सत्य के अधिकारी बन जाते हैं। पूर्ण सत्य का आग्रह अनुचित है।
 वह निर्वाण में ही प्राप्त हो सकता है। निर्वाण अत्मा का कैवल्य है। कर्म के प्रभाव से पुद्गल की गति आत्मा के प्रकाश को आच्छादित
 करती है। यह "आस्रव" कहलाता है। यही आत्मा का बंधन है। तप, त्याग, और सदाचार से इस गति का अवरोध "संवर" तथा संचित 
कर्मपुद्गल का क्षय "निर्जरा" कहलाता है। इसका अंत "निर्वाण" में होता है। निर्वाण में आत्मा का अनंत ज्ञान और अनंत आनंद प्रकाशित
होता है।

बौद्ध दर्शन

बुद्ध के उपदेश तीन पिटकों में संकलित हैं। ये सुत्त पिटक, विनय पिटक और अभिधम्म पिटक कहलाते हैं। ये पिटक बौद्ध धर्म के आगम
 हैं। क्रियाशील सत्य की धारणा बौद्ध मत की मौलिक विशेषता है। उपनिषदों का ब्रह्म अचल और अपरिवर्तनशील है। बुद्ध के अनुसार
 परिवर्तन ही सत्य है। पश्चिमी दर्शन में हैराक्लाइटस और बर्गसाँ ने भी परिवर्तन को सत्य माना। इस परिवर्तन का कोई अपरिवर्तनीय
 आधार भी नहीं है। बाह्य और आंतरिक जगत् में कोई ध्रुव सत्य नहीं है। बाह्य पदार्थ "स्वलक्षणों" के संघात हैं। आत्मा भी मनोभावों
 और विज्ञानों की धारा है। इस प्रकार बौद्धमत में उपनिषदों के आत्मवाद का खंडन करके "अनात्मवाद" की स्थापना की गई है। फिर
 भी बौद्धमत में कर्म और पुनर्जन्म मान्य हैं। आत्मा का न मानने पर भी बौद्धधर्म करुणा से ओतप्रोत हैं। दु:ख से द्रवित होकर ही बुद्ध ने
 सन्यास लिया और दु:ख के निरोध का उपाय खोजा। अविद्या, तृष्णा आदि में दु:ख का कारण खोजकर उन्होंने इनके उच्छेद को निर्वाण
 का मार्ग बताया।
अनात्मवादी होने के कारण बौद्ध धर्म का वेदांत से विरोध हुआ। इस विरोध का फल यह हुआ कि बौद्ध धर्म को भारत से निर्वासित होना
 पड़ा। किंतु एशिया के पूर्वी देशों में उसका प्रचार हुआ। बुद्ध के अनुयायियों में मतभेद के कारण कई संप्रदाय बन गए। जैन संप्रदाय वेदांत 
के समान ध्यानवादी है। इसका चीन में प्रचार है।
सिद्धांतभेद के अनुसार बौद्ध परंपरा में चार दर्शन प्रसिद्ध हैं। इनमें वैभाषिक और सौत्रांतिक मत हीनयान परंपरा में हैं। यह दक्षिणी 
बौद्धमत हैं। इसका प्रचार भी लंका में है। योगाचार और माध्यमिक मत महायान परंपरा में हैं। यह उत्तरी बौद्धमत है। इन चारों दर्शनों
 का उदय ईसा की आरंभिक शब्ताब्दियों में हुआ। इसी समय वैदिक परंपरा में षड्दर्शनों का उदय हुआ। इस प्रकार भारतीय पंरपरा में 
दर्शन संप्रदायों का आविर्भाव लगभग एक ही साथ हुआ है तथा उनका विकास परस्पर विरोध के द्वारा हुआ है। पश्चिमी दर्शनों की भाँति 
ये दर्शन पूर्वापर क्रम में उदित नहीं हुए हैं।
वसुबंधु (400 ई.), कुमारलात (200 ई.) मैत्रेय (300 ई.) और नागार्जुन (200 ई.) इन दर्शनों के प्रमुख आचार्य थे। वैभाषिक मत बाह्य 
वस्तुओं की सत्ता तथा स्वलक्षणों के रूप में उनका प्रत्यक्ष मानता है। अत: उसे बाह्य प्रत्यक्षवाद अथवा "सर्वास्तित्ववाद" कहते हैं।
 सैत्रांतिक मत के अनुसार पदार्थों का प्रत्यक्ष नहीं, अनुमान होता है। अत: उसे बाह्यानुमेयवाद कहते हैं। योगाचार मत के अनुसार
 बाह्य पदार्थों की सत्ता नहीं। हमे जो कुछ दिखाई देता है वह विज्ञान मात्र है। योगाचार मत विज्ञानवाद कहलाता है। माध्यमिक मत
 के अनुसार विज्ञान भी सत्य नहीं है। सब कुछ शून्य है। शून्य का अर्थ निरस्वभाव, नि:स्वरूप अथवा अनिर्वचनीय है। शून्यवाद का यह
 शून्य वेदांत के ब्रह्म के बहुत निकट आ जाता है।

अंतिम अरण्य

…पता नहीं, मरने के बाद आदमी दूसरा जन्म लेता है या नहीं, पर जो पीछे रह जाते हैं, उनके पुनर्जन्म की आशा बन जाती है


मृत्यु एक घटना है, वह सिर्फ बर्फ की तरह सुन्न कर देती है | पीड़ा बाद में आती है, काल की तपन में बूंद-बूंद पिघलती हुई |


क्या था जो जलती लकड़ियों की राख से निकलकर बाहर आया था…कोई इशारा जो मृत आखिरी बार अपने जीवितों के लिए छोड़ जाता है, सृष्टि में होने का अपना कोई निशान, कोई बीता हुआ सुखी दिन, कोई बचा हुआ दुःख, कोई छुटा हुआ पछतावा, जिसे आखिरी बार लपटे अपने में समेटकर लुप्त हो जाती हैं, राख हो जाती हैं ? पता भी नहीं रहता, यह आदमी कभी दुनिया में आया था | आदमी खाली हाथ आता है, पर जाता है तो अपने साथ सब कुछ ले जाता है | 


आदमी जीता एक जगह पर है, पर मरने के बाद वह हर व्यक्ति के भीतर अपनी एक जगह बना लेता है | उसका होना धुंधला पड़ जाता है, उसका न होना उजला हो जाता है, इतना उजला और साफ़ लगता है कि वह हम सबके बीच बैठा है, एक जैसा नहीं, बल्कि अलग-अलग | आग में जलनेवाला शारीर एक ही रहता है, पर हम में से हर कोई अपने-अपने साहिब जी को जलता हुआ देख रहे था…जितना ही वह तिल-तिल भस्मीभूत होते जाते थे…उनके नाख़ून, उनके बाल, उनकी मांस-मज्जा, उनका माथा…उतने ही वे हमारे भीतर मुकम्मिल होते जाते थे |



…जबरदस्ती नहीं होती कि साथ बैठने का मतलब एक दुसरे से बोलना ही हो |
…कभी-कभी तो हमें याद भी नहीं रहता कि हम साथ बैठे हैं |
जब दो लोग बहुत दिनों तक साथ रहते हैं, तो अक्सर ऐसा ब्रह्म होता है कि वे एक दुसरे से को सुन रहे हैं, हालाँकि उनमे से बोल कोई भी नहीं रहा होता है |

बहुत बार सुना है कि बुढ़ापे में लोग बच्चे से हो जाते हैं..किन्तु जान पड़ा है कि बचपन और बुढ़ापे से परे भी एक स्टेशन होता है – जहाँ मनुष्य उम्र का खूंटा छुड़ाकर सब stage एक साथ पार करता जाता है, आगे – पीछे की दिशाओं का कोई बोध नहीं रहता…कोई भी कदम कहीं भी पड़ सकता है | पता भी नहीं चलता किस क्षण वह किस आयु की शिला पर खड़े होकर अपनी दुनिया को देख रहे हैं |
…और वह दुनिया भी एक जगह स्थिर नहीं रहती…

Thursday, February 7, 2013

भ्रष्ट राजनेता बदनाम सरकारें

 बात साठ के दषक के अंत की है जब तत्कालीन राश्ट्रपति डा0 राजेंद्र प्रसाद ने प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को पत्र लिखा था जिसमें उस समय के भ्रश्टाचार पर चिंता जताई गई थी। जिसके जवाब में प्रधानमंत्री ने कहा था कि वह स्थिति पर नज़र रखे हुए हैं। आज़ादी के तुरंत बाद बहुत चर्चित जीप कांड का घोटाला सामने आया था तो कैग की रिपोर्ट पर प्रधानमंत्री ने कहा था कि कैग को अति विष्वसनीय बताते हुए तुरंत कार्रवाई करते हुए लिप्त कश्ण मेनन का इस्तीफा मांगा व कार्रवाई की थी।
इसके बाद भी भ्रश्टचार के अनेक मामले सामने आए जिनमें से कुछ में कार्रवाई भी हुई कुछ में नहीं भी हुई। जेपीसी का भी गठन कई बार हुआ। कंग्रेस सरकार अपने इतिहास को भूली तो नहीं होगी । उस समय मीडिया इतना ताकतवर भी नहीं था। अब जब कि मीडिया इतनी ताकतवर है कि मंत्रालय किसको मिलना चाहिए ये फैसला भी कुछ मीडिया दलाल करते है। खैर यह एक अलग बात है। भाजपा कैग की रपट के बाद जेपीसी की मांग कर रही हैॅ। ये भी कोई तुक की बात नहीं है क्योकि अभी तक कैग की रपट पर सीधी कार्रवाई होती आई है जो अब भी होनी चाहिए। जिससें आम जनता में यह विष्वास पनप सके कि सरकार की नीयत में कोई खोट नहीं है क्योकि सरकार प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जी की छवि को कब तक दागदार करती रहेगी । निष्चित ही प्रधानमंत्री जी की छवि ईमानदार व्यक्ति की है पर ऐसी ईमानदारी किस काम की जिसकी ओट में राजा जी,सुरेष कलमाडी, अषोक चव्हाण जैसे लोग जनता के साथ धोखेबाजी कर रहे हो। इस सब का श्रेय किसके माथे वर होगा। आम जनता के लिए प्याज भी मयस्सर नहीं है और उदयोगपति स्पैक्टम को भी दलालों के साथ मिलकर आराम से डकार ले रहैं हो। भाजपा मुख्य विपक्षी दल है। उसका काम है साकार को ये याद दिलाना कि आप जो कुछ भी फैसले ले रहै है उसमें जो कुछ भी जनता के हित में न हो सरकार के ऐसे फैसलों को लेने में आगाह करना कि क्या ये फैसले देषहित में है़ अगर नहीं है तो उनपर सोचा जाए। जो एक तरह से देखा जाए तो कर भी रही है। किंतू संसद में काम ही न हो इस षर्त पर कतई नहीं। काग्रेस की भी कार्यषैली की भी आलोचना की जानी चाहिए। काॅमनवेल्थ के मामले में एक मजे की बात जब भ्रश्टाचार को लेकर भाजपा ने षोर गुल किया तो एक भाजपाई दलाल को मीडिया के सामने खडा कर दिया । और बडे षान से कहा कि भ्रश्ट कौन। जबकि होना तो ये चाहिए था कि बगैर राजनैतिक द्वैष के सभी घौटालेबाजों को सामने लाने का साहस सरकार को करना चाहिए था। सरकार को ये कभी नहीं समझना चाहिए कि जनता के पास दिमाग जैसी चीज का अभाव हैै और अगर वह ऐसा समझती है तो बिहार जैसे परिणामों के तैयार रहे।



 

Saturday, June 16, 2012

सभ्यता के संघर्ष में हिंदुत्व की पूर्व पीठिका :- 2

 वास्तव में सभ्यताओ का संघर्ष मूलत: सेमेटिक दर्शन और भारतीय दर्शन के बीच ही मुख्य रूप से हैं !
भारतीय दर्शन अगर पक्ष हैं तो सेमेटिक दर्शन विपक्ष ! ये आधुनिक युग में एक अलग प्रकार के देवासुर संग्राम की प्रस्तावना हैं !
ये देवासुर संग्राम का कलयुगी संस्करण हैं ! भारतीय दर्शन और सेमेटिक दर्शन की अवधारणाओ और संकल्पनाओ में एक मूलभूत गहरा

अंतर हैं ! ये एक दुसरे के ठीक विपरीत हैं ! सेमेटिक दर्शन की तुलना भारतीय दर्शन से नहीं हों सकती क्योकि एक अविकसित -

अपूर्ण मध्यकालीन बर्बरता से युक्त राजनितिक महत्वकांक्षा की साम्प्रदायिक अभिव्यक्ति  ही सेमेटिक दर्शन हैं, जबकि भारतीय दर्शन

एक सुव्यवस्थित वैचारिकी की लाखो वर्षों की परम्परा का नाम हैं ! परन्तु ऐतेहासिक विडंबना के तौर पर  बर्बरता ने उच्च किस्म की

बौद्धिकता व आध्यात्मिकता को पददलित कर विजित किया तो मामला भारतीय दर्शन बनाम सेमेटिक दर्शन हों भी गया !
शायद इसमे भारतीयों की महाभारत युद्ध के बाद सैनिक दृष्टि से कमजोर केन्द्रीय सत्त्ताओ ने अपने कृण्वन्तो विश्वार्यम ,दिग्विजय व
चक्रवर्ती साम्राज्य की संकल्पनाओ को परे धकेल दिया जिस कारण बाद की पीढ़ी के भाग्य में सर्वाधिक मार्मिक सैनिक हार के

सिलसिले का दुर्भाग्य लिखा गया ! बहरहाल अंतिम लड़ाई जीतने वाला ही विजेता होता हैं अत : इस मामले में पिक्चर अभी बाकी हैं

मेरे दोस्त ! सेमेटिक दर्शन के विभिन्न समुदाय जैसे मुसलमान , ईसाई व यहूदी आपस में युद्धरत हैं उसी प्रकार भारतीय हिंदू दर्शन की

भी आंतरिक मोर्चे में जबरदस्त संघर्ष की स्थिति बनी हुयी हैं ! अगर जय भारत करना हैं तो उससे पूर्व महाभारत भी जरूरी हैं ,
परन्तु इस महाभारत के आंतरिक और बाह्य दोनों मोर्चो पर कई बड़े चक्रव्यूह हैं जिन्हें भेदकर ही हम चक्रवर्ती हों सकते हैं !
धर्म युद्ध से पूर्व अंत:कर्ण की परम-शुद्धि आवश्यक हैं ! आएये कुछ कड़वी बाते करे क्योकि ये हमारी बीमार कमजोर आत्मा के लिये

अमृततुल्य ओषधि हैं       


                                                                                        ( क्रमश: )
                                                                              सुप्रसिद्ध समतामूलक विचारक
                                                                                     श्री विद्याभूषण