…पता नहीं, मरने के बाद आदमी दूसरा जन्म लेता है या नहीं, पर जो पीछे रह जाते हैं, उनके पुनर्जन्म की आशा बन जाती है
मृत्यु एक घटना है, वह सिर्फ बर्फ की तरह सुन्न कर देती है | पीड़ा बाद में आती है, काल की तपन में बूंद-बूंद पिघलती हुई |…
क्या था जो जलती लकड़ियों की राख से निकलकर बाहर आया था…कोई इशारा जो मृत आखिरी बार अपने जीवितों के लिए छोड़ जाता है, सृष्टि में होने का अपना कोई निशान, कोई बीता हुआ सुखी दिन, कोई बचा हुआ दुःख, कोई छुटा हुआ पछतावा, जिसे आखिरी बार लपटे अपने में समेटकर लुप्त हो जाती हैं, राख हो जाती हैं ? पता भी नहीं रहता, यह आदमी कभी दुनिया में आया था | आदमी खाली हाथ आता है, पर जाता है तो अपने साथ सब कुछ ले जाता है |
आदमी जीता एक जगह पर है, पर मरने के बाद वह हर व्यक्ति के भीतर अपनी एक जगह बना लेता है | उसका होना धुंधला पड़ जाता है, उसका न होना उजला हो जाता है, इतना उजला और साफ़ लगता है कि वह हम सबके बीच बैठा है, एक जैसा नहीं, बल्कि अलग-अलग | आग में जलनेवाला शारीर एक ही रहता है, पर हम में से हर कोई अपने-अपने साहिब जी को जलता हुआ देख रहे था…जितना ही वह तिल-तिल भस्मीभूत होते जाते थे…उनके नाख़ून, उनके बाल, उनकी मांस-मज्जा, उनका माथा…उतने ही वे हमारे भीतर मुकम्मिल होते जाते थे |
मृत्यु एक घटना है, वह सिर्फ बर्फ की तरह सुन्न कर देती है | पीड़ा बाद में आती है, काल की तपन में बूंद-बूंद पिघलती हुई |…
क्या था जो जलती लकड़ियों की राख से निकलकर बाहर आया था…कोई इशारा जो मृत आखिरी बार अपने जीवितों के लिए छोड़ जाता है, सृष्टि में होने का अपना कोई निशान, कोई बीता हुआ सुखी दिन, कोई बचा हुआ दुःख, कोई छुटा हुआ पछतावा, जिसे आखिरी बार लपटे अपने में समेटकर लुप्त हो जाती हैं, राख हो जाती हैं ? पता भी नहीं रहता, यह आदमी कभी दुनिया में आया था | आदमी खाली हाथ आता है, पर जाता है तो अपने साथ सब कुछ ले जाता है |
आदमी जीता एक जगह पर है, पर मरने के बाद वह हर व्यक्ति के भीतर अपनी एक जगह बना लेता है | उसका होना धुंधला पड़ जाता है, उसका न होना उजला हो जाता है, इतना उजला और साफ़ लगता है कि वह हम सबके बीच बैठा है, एक जैसा नहीं, बल्कि अलग-अलग | आग में जलनेवाला शारीर एक ही रहता है, पर हम में से हर कोई अपने-अपने साहिब जी को जलता हुआ देख रहे था…जितना ही वह तिल-तिल भस्मीभूत होते जाते थे…उनके नाख़ून, उनके बाल, उनकी मांस-मज्जा, उनका माथा…उतने ही वे हमारे भीतर मुकम्मिल होते जाते थे |
…जबरदस्ती नहीं होती कि साथ बैठने का मतलब एक दुसरे से बोलना ही हो |
…कभी-कभी तो हमें याद भी नहीं रहता कि हम साथ बैठे हैं |
जब दो लोग बहुत दिनों तक साथ रहते हैं, तो अक्सर ऐसा ब्रह्म होता है कि वे एक दुसरे से को सुन रहे हैं, हालाँकि उनमे से बोल कोई भी नहीं रहा होता है |
बहुत बार सुना है कि बुढ़ापे में लोग बच्चे से हो जाते हैं..किन्तु जान पड़ा है कि बचपन और बुढ़ापे से परे भी एक स्टेशन होता है – जहाँ मनुष्य उम्र का खूंटा छुड़ाकर सब stage एक साथ पार करता जाता है, आगे – पीछे की दिशाओं का कोई बोध नहीं रहता…कोई भी कदम कहीं भी पड़ सकता है | पता भी नहीं चलता किस क्षण वह किस आयु की शिला पर खड़े होकर अपनी दुनिया को देख रहे हैं |
…और वह दुनिया भी एक जगह स्थिर नहीं रहती…
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