यूपी चुनाव में टीवी पर एक राष्ट्रीय पार्टी का विज्ञापन आ रहा है जिसमे एक औरत दरवाजा खोलती है,एक युवक आता है
अब औरत कहती है जब से इन्द्रा जी ने बैंको का राष्टीयकरण करके बैक के दरवाजे खोले है सब ठीक हो गया
अब औरत कहती है जब से इन्द्रा जी ने बैंको का राष्टीयकरण करके बैक के दरवाजे खोले है सब ठीक हो गया
यह एक चुनावी विज्ञापन है जो किसानों की आत्महत्याओ को छिपाने की कोशिश करता है, इस विज्ञापन के पीछे की स्थिति क्या है? जिसको को विज्ञापन नही दिखा पाता असलियत ये है कि बिदर्भ के अकोला जिले के एक किसान ने इसलिए आत्महत्या कर ली क्योकि उसने कृषक को- ओपरेटिव सोसायटी से 37000 का कर्ज ले रखा था पांच एकड़ से जरा सा ज्यादा भूमि होने के कारण उसको कर्ज से माफ़ी तक ना मिली और फसल बर्बाद हो गयी वो अलग, उसके पांच बेटियां है जिनमे से दो शादी के योग्य है ! वर्धा जिले के सेतुपद गाँव के किसान सुधाकर पोटे ने भी फाँसी लगा ली उसने भी कर्ज ले रखा था ओए पंद्रह एकड़ जमीन होने के कारण उसको सरकार से कर्ज माफ़ ना हुआ, किसानों द्वारा की जा रही आत्महत्याओ के पीछे के कारण क्या है ? भारत में कृषि से आधारित आजीविका पर आश्रित लोगों की संख्या साठ प्रतिशत के लगभग है और आमतौर पर किसानों को अपनी फसल के उत्पादन के लिए बहुत सारी चीजों की आवश्यकता पड़ती है, जिसमे खेत में बुबाई के लिए बीज से उसको मार्केट में पहुचने तक के लिए जिन संसाधनों की जरुरत होती है क्या वह उनके
पास है;और सरकार उनके काम को यानि कृषि को लेकर जो निति निर्धारण करती है उसमे किसानों की आजीविका को भलीभांति चलाये रखने के काबिल है या नही! क्योकि जिस तरह से लगातार किसान अपनी जान ले रहे है उसको देख कर साफ लग रहा है कि सरकार की निति किसानो के हित में नहीं है आज देश में स्तिथि इस तरह की हो गयी है की किसान अपने आप को असहाय महसूस कर रहा है ! कोई एक वजह इस तादात में आत्महत्याओ के लिए जिम्मेदार नही हो सकती है लेकिन कर्ज सबसे बड़ा कारण हो सकता ये कहना सही होगा, ये कर्ज सरकार का भी होता और जमींदार का भी, और जब किसान को लगने लगता है की अब वह अपना कर्ज नही चूका पाएगा तो आत्महत्या कर लेता है इसके पीछे आर्थिक-सामाजिक कारण भी है,
किसान की जितनी ज्यादा जमीन होगी उसकी सामाजिक इज्जत भी उतनी ही ज्यादा, और कर्ज भी उतना ही ज्यादा और जब किसान के घर बैंक या कर्ज देने वाले लोग जाते है तो वह महसूस करता है कि अब क्या बचा , सरकार कि कर्ज देने कि निति कि जिनती आलोचना की
जाये उतनी ही कम है, क्योकि इसमे बैंक अपना पैसा देते है सरकार की नीतियों
पर तो बैंक में 15 प्रतिशत से ज्यादा तो किसानों से पहले ही रिश्वत के रूप में खा जाते है दूसरा कर्ज लेते समय ही किसान ये मान कर चलता है कि कर्ज चुकाना है ही नहीं, सरकार माफ़ कर देगी,
एक वजह और ये भी है की जब किसान के घर में उसकी फसल होती है तो उसके दम इतने कम होते है की लागत भी पूरी नही पड़ती और मार्केट इतनी कमजोर होती है उसकी फसल को खरीद भी नही पाती, पिछले दिनों पंजाब में किसानो ने आलू को सडको पर फेक दिया क्योकि उनको अपनी फसल का सही दम तक नही मिल रहा था, ये पंजाब की ही बात नहीं है हर जगह की बात है, गन्ना किसान गन्ने को उगाते है लेकिन
सरकारी चीनी मिल उसको खरीदने की हालत में नहीं होती, खरीद भी ले तो उनके पैसे समय पर नही दे पाती. और रही सही क़सर उस समय निकल जाती है जब मोसम के अनुरूप बारिश नही हो पाती, विदर्भ में किसानो के पास अपनों भूमि को सीचने के लिए पानी तक नही नही होता और बीज और खाद की महगाई इतनी है कि उनके पास बीज खरीदने के लिए पैसा है ना फसल में लगाने के लिए आवश्यक कीटनाशक दवाये, किसी तरह
से ले भी आये जल स्तर इतना कम है कि पानी नही !
१९६० में एक सोने के सिक्के का मूल्य एक क्विंटल चावल था आज सोना दस गुना तक ज्यादा है तो किया क्या जाये! सरकारी आकडे बताते है कि पिछले एक दशक में रहन सहन में 100 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है लेकिन फसलो के दम नही बढे है , इस तरह से देखे तो सरकार की किसानो के लिए जो नीतिया है वो साफ नही है, जिसकी वजह से किसान अपने खेतो में फसल की जगह आत्महत्ये उगा रहे है ये भारत जैसे देश का दुर्भाग्य है सब को जिन्दा रखने के लिए कृषि करने वाला किसान आत्महत्या कर रहा है
और अंत में -
पता है जब कोई किसान कर्ज को वापस ना करने की स्थिति में आत्महत्या करता है ना !
तो उसके घर वाले समझ तक नही पते कि वह किसके लिए रोये?
जो मर गया है उसके लिए या जो कर्ज अभी तक नहीं चुक पाया है उसके लिए !
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